जिफ के दूसरे दिन हुई देश-दुनिया की फिल्मों की खास स्क्रीनिंग
सत्रों में हुई सार्थक चर्चाएं

जयपुर । शहर में चल रहे पांच दिवसीय जयपुर इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल के दूसरे दिन शनिवार को देश-विदेश की कई फिल्मों की खास स्क्रीनिंग हुर्इं। साथ फिल्मी हस्तियों की रोचक चर्चाओं के सेशन्स से सराबोर रहा। जिफ के फाउंडर डायरेक्टर हनुरोज ने बताया कि 80 फिल्मों के चयनित कार्यक्रम में 18 फीचर फिक्शन, 37 शॉर्ट फिक्शन और 9 प्रभावशाली डॉक्यूमेंट्री की खास स्क्रीनिंग हुर्इं। इन फिल्मों ने दर्शकों को अंत तक बांधे रखा। हिंदी सिनेमा की अमिट धरोहर का जश्न मनाने के लिए इस साल की विशेष थीम नवरत्न के तहत 9 आइकोनिक हिंदी फिल्मों को प्रदर्शित किया जा रहा है। 18 जनवरी को इन 9 में से 3 क्लासिक फिल्मों की स्क्रीनिंग जीटी की स्क्रीन 1 (आॅडी 1) में हुई। प्रेमथेश चंद्र बरुआ निर्देशित फिल्म देवदास (1936), राकेश ओमप्रकाश मेहरा निर्देशित रंग दे बसंती (2006) समेत यश चोपड़ा निर्देशित वीर-जारा (2004) को दर्शकों ने सराहा।
परिवार को कला से रहा गहरा रिश्ता : मेहरा
प्रसिद्ध फिल्मकार राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने विशेष सत्र के दौरान अपनी रचनात्मक यात्रा और फिल्म निर्माण की विचारधारा पर अनुभव साझा किए। उन्होंने कहा कि हमने रंग दे बसंती नहीं बनाई, फिल्म ने हमें बनाया। राकेश ओमप्रकाश मेहरा का सिनेमा से नाता उनके प्रसिद्ध निर्देशन करियर से भी गहरा है। एक भावुक क्षण में, उन्होंने बताया कि उनके पिता की पहली नौकरी एक थिएटर में टॉर्चमैन की थी, जिसने उनके परिवार का कला से रिश्ता स्थापित किया। सामाजिक मुद्दों पर फिल्में बनाने वाले फिल्मकार का रास्ता चुनौतियों से खाली नहीं होता। मेहरा ने एक रेडियो कार्यक्रम के दौरान मिली मौत की धमकी का क्षण साझा किया। साथ ही अपनी फिल्मों की विषय-वस्तु के कारण सामना किए गए विभिन्न कानूनी संघर्षों के बारे में बताया। उन्होंने बताया कि रंग दे बसंती का एक कोर्ट केस फिल्म की रिलीज के 19 साल बाद, महज 3 महीने पहले खत्म हुआ। इन अनुभवों ने उन्हें हतोत्साहत करने के बजाए महत्वपूर्ण कहानियां कहते रहने के लिए और मजबूत बनाया। प्रसिद्ध फ्रांसीसी फिल्म निमार्ता मार्क बार्श ने कोविड महामारी के बाद फिल्मों के विभिन्न प्रदर्शनों पर अंतर्दृष्टि साझा की।
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