ज्ञानार्जन का सशक्त माध्यम है साहित्य संपदा : आचार्य महाश्रमण
राजसमंद: जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के प्रथम अनुशास्ता आचार्यश्री भिक्षु की जन्म त्रिशताब्दी वर्ष के अवसर पर महाचरण कार्यक्रम कंटालिया में आयोजित किया गया। मुख्य कार्यक्रम का शुभारंभ आचार्यश्री महाश्रमण के मंगल महामंत्रोच्चार से हुआ। उन्होंने धर्मसंघ को पावन प्रतिबोध प्रदान करते हुए धर्म के तीन आयामों के बारे में बताया, जिसमें तप का तीसरा आयाम और उसके 12 प्रकार विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। उन्होंने बताया कि इनमें दसवां प्रकार स्वाध्याय है, जो ज्ञानार्जन और साहित्य संपदा के विकास का मार्ग है। आचार्यश्री ने कहा कि तेरापंथ धर्मसंघ की चारित्रात्माओं ने अनेक ग्रंथों की लिपियां तैयार की हैं। वर्तमान में जैन विश्व भारती साहित्य प्रकाशन इन ग्रंथों का संरक्षण कर रहा है और समाज में ज्ञान का प्रसार कर रहा है। उन्होंने अतीत में आचार्यश्री भिक्षु, श्रीमज्जयाचार्य, गुरुदेव तुलसी और आचार्यश्री महाप्रज्ञ के साहित्य योगदान का स्मरण करते हुए कहा कि यह ज्ञानावरणीय कर्म का अनमोल अवदान है।
कार्यक्रम में साधु-साध्वियों, समणीवृंद और महिला मण्डल की मौजूदगी रही। साध्वी राजीमती की पुस्तक आत्म विशोधि पथ का जैन विश्व भारती के माध्यम से लोकार्पण किया। साध्वी सम्यकप्रभा ने गीत प्रस्तुति दी और अनिता डागा ने भी गीत कार्यक्रम में भाग लिया। बभान-झंझाड़िया स्कूल के छात्र-छात्राओं ने विशेष सहभागिता दिखाई। प्रधानाध्यापक महेन्द्रसिंह रावत ने कार्यक्रम में अपने विचार व्यक्त किए। इस अवसर पर आचार्यश्री महाश्रमण ने सभी साधु-साध्वियों और विद्यार्थियों को मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। कार्यक्रम का मुख्य संदेश ज्ञानार्जन, साहित्य संपदा के संरक्षण और तेरापंथ दर्शन के माध्यम से समाज में नैतिक एवं आध्यात्मिक विकास को बढ़ावा देना रहा। आचार्यश्री भिक्षु की भिक्षु चेतना वर्ष और उनके अद्भुत साहित्यिक योगदान को महाचरण के माध्यम से सम्मानित किया गया।
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