रिश्तों में भरोसा करो..मगर किसी के भरोसे मत रहो: अंतर्मना प्रसन्न सागर
रिश्तों में सहयोग से ज्यादा साथ जरूरी
निवाई :अंतर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागर महाराज ने गुरु भक्तों को संबोधित करते हुए आचार्य श्री ने कहा कि जो सुख में साथ दे वो रिश्ते, और जो दु:ख में साथ दे वो फ़रिश्ते। रिश्ता कोई भी हो – यदि वह शक की दीमक से दूर है और विश्वास नींव से मजबूत है, तो कभी डेमेज नहीं हो सकता। रिश्ते किसी कागज पर लिखी शर्तो पर नहीं चलते, क्योंकि जरूर मुकरे होंगे वे लोग जुबान देकर, वरना कागजों की जरूरत रिश्तों में नहीं पड़ती। रिश्ते भावनाओं की गिली मिट्टी के मानिन्द हुआ करते हैं, जो विश्वास की धूप और प्रेम समर्पण के पानी से मजबूत होते रहते हैं ।
जहां रिश्तों में शक का प्रवेश हुआ तो विश्वास डगमगाने लगता है और धीरे-धीरे रिश्ते भीतर ही भीतर खोखले होने लगते हैं। फिर रिश्तों और सम्बन्धों की उम्र रोज रोज घटने लगती है। बाहर से सब कुछ सामान्य दिख सकता है, बातचीत भी सामान्य रूप से चलती रहेगी, साथ उठना-बैठना, खाना-पीना भी चलता रहेगा, लेकिन भीतर से कहीं न कहीं दरार पड़ चुकी है। यह दरार एक दिन में नहीं बनती, बल्कि यह दरार भीतर ही भीतर रिश्तों को खोखला करती जाती है। जैसे – कभी एक झूठ, कभी अधूरा सच, कभी वक्त पर साथ न खड़े होने की टीस, यह सब छोटे-छोटे से कारण विश्वास की नींव को कमज़ोर करने लगती है।
आज की तेज रफ्तार की ज़िन्दगी में अक्सर कहा जाता है कि समय नहीं, बल्कि रिश्तों की अहमियत कम हुई है। *रिश्तों को जिन्दा रखने के लिए कोई बहुत बड़ा त्याग नहीं करना, बल्कि छोटे-छोटे सच और थोड़ा रिश्तों की भावनाओं का ध्यान रखना है। पुरानी पीढ़ियों के रिश्ते इसलिए निभ रहे थे, क्योंकि उनके पास भरोसा गहरा था और संवाद का धैर्य था। रिश्ते जीवन की सबसे बड़ी कमाई है। इन्हें सम्भालने के लिए थोड़ा समय, थोड़ा वाणी व्यवहार, और थोड़ा मान सम्मान का ध्यान रखा जाये तो सब कुछ अच्छे से अच्छा हो सकता है ।
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