भूगर्भ से प्राप्त 26 जिन प्रतिमाओं का वा प्राकट्य उत्सव

विश्व शांति की कामना के लिए शांतिधारा, एवं पंचामृत अभिषेक त्याग धर्म में राजा श्रेयांस ने सबसे पहले दानतीर्थ का प्रवर्तन किया: आचार्य श्री वर्धमान सागर जी

Sep 5, 2025 - 00:50
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भूगर्भ से प्राप्त 26 जिन प्रतिमाओं का वा प्राकट्य उत्सव
भूगर्भ से प्राप्त 26 जिन प्रतिमाओं का वा प्राकट्य उत्सव
भूगर्भ से प्राप्त 26 जिन प्रतिमाओं का वा प्राकट्य उत्सव

टोंक: श्री आदिनाथ दिगंबर जैन नसिया अमिरगंज टोंक एवं श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन बड़ा मंदिर में विराजमान 26 जिन प्रतिमाओं का प्रकटउत्सव शुक्रवार आज बड़े हर्ष और उल्लास के साथ जैन नसिया में मनाया जाएगा समाज के प्रवक्ता पवन कंटान एवं विकास जागीरदार ने बताया कि आज से वर्ष पूर्व भाद्रपद शुक्ला त्रयोदशी गटका तेरस 21 सितंबर 1953 ईस्वी को जैन नसियाँ के पीछे एक भूखंड पर भूगर्भ से एकसाथ भव्य ,विशाल मनमोहक एवं अतिशयकारी 26 जिन प्रतिमाएं प्राप्त हुई थी जो लगभग 600 वर्ष प्राचीन प्रतिष्ठित है टोंक क्षेत्र मेंभूगर्भ से लगभग 65जिन प्रतिमाएं चार बार प्राप्त हो चुकी है जो श्री दिगंबर जैन नसियाँ एवं शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिरबड़ा तख्ता में विराजमान है साथ ही 13 प्रतिमाएं वर्तमान में सोनीजी की नसियां अजमेर में विराजमान है

समाज के मंत्री धर्मेद्र पासरोटियां एवं कमल सर्राफ ने बताया कि शुक्रवार को जैन नसिया के "बड़े बाबा" मूलनायक1008 श्री आदिनाथ भगवान के प्रकट उत्सव के दिन प्रातः काल की बेला में विश्वमें शांति की कामना के लिए आचार्य श्री ससंघ के सानिध्य में उनके मुखारबिंद से अभिषेक ,शांतिधारा के पश्चात महापंचामृत अभिषेक जिसमें दूध दही ,घी केसर, फल का रसों से, सर्व औषधी आदि स्वर्ण एवं रजत झारियां से महापंचामृत अभिषेक किए जाएंगे तत्पश्चात आदिनाथ भगवान की विशेष पूजा अर्चना होगी पर्यूषण पर्व के दिन गुरुवार को प्रातः काल आठवें दिन अभिषेक शांतिधारा के पश्चात इंद्रध्वज महामंडल विधान की पूजा अर्चना प्रतिष्ठाचार्य कीर्तीय जी शास्त्री पारसोला के साथ पूजा अर्चना करके अर्घ्य समर्पित किए गए

इस मौके पर उत्तम त्याग धर्म की पूजा की गई इसी तरह बड़ा तख्ता जैन मंदिर में दशलक्षण महापर्व के तहत प्रातकाल श्रद्धालुओं ने अभिषेक शांतिधारा के पश्चात सामूहिक पूजाअर्चना की । सायकाल की बेला में महाभव्य आरती, आचार्य श्री की आरती व गुरुभक्ति का आयोजन किया जाता है।

दशलक्षण धर्म में पहले दिन से चार कषायों का त्याग करने की शिक्षा उपदेश दिया गया शास्त्रों में पूजन में उल्लेख है कि दान चार प्रकार का चार संघ को दीजिए ।त्यागधर्म चार प्रकार के दान आहार,ज्ञान,अभय और शास्त्रदान से होता हैं। साधु को आहारदान देने में चारों दान समाहित हैं। दान हमेशा उत्तम पात्र को संयम उपकरण पीछी कमंडल शास्त्र और आहारदान, औषधिदान देना चाहिए। श्रावक को हमेशा साधु के लिए शुद्ध भोजन बनाकर साधु के लिए द्वार प्रेक्षण करना चाहिए इस निमित आप भी शुद्ध भोजन करते हैं यदि साधु का आहार नहीं होता हैं तो भी द्वार प्रेक्षण करने से पुण्य की प्राप्ति होती हैं। जिस प्रकार छोटे बीज एक दिन बड़ा वृक्ष बन जाता है ,उसी प्रकार छोटे-छोटे त्याग करने से भी एक दिन आप भी आत्मा से परमात्मा बन सकते हैं। त्याग चेतन और अचेतन द्रव्य का किया जाता है जिन्होंने चेतन द्रव्य का त्याग किया वह आज साधु बनकर ऊपर मंच पर बैठे हैं यह मंगल देशना आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने उत्तम त्याग धर्म के दिन धर्म सभा में प्रकट की। राजेश पंचोलिया के अनुसार आचार्य श्री ने आगे बताया कि प्रथम तीर्थंकर श्री आदिनाथ भगवान ने 6 माह तप ध्यान किया , उसके बाद अगले 6 माह तक उन्हें आहार नहीं मिला तब राजा श्रेयांश को पूर्व जन्म में आहार देने का जाती स्मरण से भगवान आदिनाथ को सर्वप्रथम आहार दान देकर दान तीर्थ का प्रवर्तन किया। इस 20वीं सदी में भी प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी महाराज को क्षुल्लक अवस्था में भी चार दिनों तक उचित विधि से पड़गाहन नहीं करने के कारण आहार नहीं हुआ था। द्रव्य के त्याग से आप इंद्र ध्वज मंडल विधान की पूजन कर पुण्य ओर आनंद की अनुभूति कर रहे हो।आचार्य श्री ने आर्यिका श्री ज्ञानमति जी के शीघ्र स्वस्थ होने की मंगल भावना की । आचार्य श्री ने बताया कि राजा श्री वेग ने दो चारण रिद्धिधारी मुनि अर्ककीर्ति और अमितकीर्ति को आहारदान देने के बाद भगवान शांतिनाथ हुए ,इसी प्रकार श्रीकृष्ण ने भी मुनिराज को औषधीदान देकर तीर्थंकर प्रकृति का बंध किया ।औषधी दान से साधु के संयम ,व्रत, ध्यान तप की रक्षा होती है ।त्याग से राग द्वेष परिग्रह कम होता हैं त्याग से यश बढ़ता है, त्याग से सद गति मिलती है, त्याग से आनंद होता हैं श्रावक श्राविकाओं के 6 आवश्यक कार्यों में पूजा और दान प्रमुख हैं। अंगदान शास्त्र अनुसार ठीक नहीं है आपके अंग का दुरुपयोग व्यसन या हिंसा में हो सकता हैं आचार्य श्री ने एक महत्वपूर्ण सूत्र बताया कि आत्म स्वभाव ,निज पद को परिग्रह त्याग कर प्राप्त कर सकते हैं । देश विश्व यदि इन दश धर्मों को अपनाता हैं तो सुख और शांति हो सकती हैं।अनेक कथा और उदाहरण से बताया कि त्याग और दान में अनेक प्रसिद्ध हुए हैं एक ग्वाला मुनिराज को शास्त्र देने से अगले जन्म में कुंदकुंद आचार्य हुए।

आज त्याग धर्म का दिन टोंक में स्मरणीय हो गया जब अनेक भक्तों ने चंचला लक्ष्मी का आहार दान में राशि देकर साधु का चौका लगाने के लिए संकल्पित हुए।

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SJK News Chief Editor (SJK News)