रेगिस्तान का ‘आक’ अब किसानों की आय का नया जरिया

बंजर भूमि से निकले आक रेशे से बन रहे हैं बेहद गर्म और हल्के कपड़े रुपये क्या आक पर लगते है ! लोक कहावत हुई चरितार्थ

May 17, 2026 - 20:47
 0  3
रेगिस्तान का ‘आक’ अब किसानों की आय का नया जरिया
रेगिस्तान का ‘आक’ अब किसानों की आय का नया जरिया
रेगिस्तान का ‘आक’ अब किसानों की आय का नया जरिया

बाङमेर/जयपुर । राजस्थान के थार रेगिस्तान में जहां बंजर रेतीली भूमि पर कुछ भी उगना मुश्किल है, वहीं एक ऐसा पौधा अब ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे रहा है — आक ( कैलोट्रोपिस गिगेंटिया )। जिसे पहले खरपतवार मानकर उखाड़ फेंका जाता था, वही आज रूमादेवीफाउंडेशन व निट्रा की अनोखी पहल ‘आक से आमदनी’ के जरिए हजारों किसान परिवारों और ग्रामीण महिलाओं के लिए स्थाई रोजगार और अतिरिक्त आय का जरिया बन गया है। वस्त्र मंत्रालय भारत सरकार के उत्तर भारत वस्त्र अनुसंधान संघ  के अनुसार आक के पोड्स से निकाले जा रहे प्राकृतिक रेशों से अब बैग, जैकेट, स्वेटर, शॉल और अन्य गर्म कपड़े तैयार हो रहे हैं, जो -20 से -40 डिग्री तापमान में भी शरीर को गर्म रखने में सक्षम हैं। निदेशक डाॅ के के परमार ने बताया कि यह न केवल रेगिस्तान की चुनौती को अवसर में बदल रहा है, बल्कि प्राकृतिक फाइबर आधारित स्थानीय उद्योग की नई मिसाल भी पेश कर रहा है।

एक पौधा, दशकों की कमाई 
रुमा देवी बताती हैं,
“आक का पौधा एक बार लगाने के बाद पहले साल से ही कैरीनुमा फल आकपाडिए का उत्पादन देना शुरू कर देता है और लगभग 10 से 12 साल तक लगातार पोड्स देता रहता है। इसमें सिंचाई या महंगी देखभाल की कोई जरूरत नहीं है। रेतीली और बंजर जमीन पर यह आसानी से पनप जाता है।”
फाउंडेशन के प्रयासों से अब किसान न केवल अपने-आप उगने वाले आक के पौधों से आकपाडिए, पोड्स इकट्ठा कर रहे हैं, बल्कि व्यवस्थित तरीके से आक की व्यवसायिक खेती भी कर रहे हैं। कई किसान परिवार ट्रक भरकर आक पोड्स भेज रहे हैं।

महिलाओं का आर्थिक सशक्तिकरण 
बाङमेर सहित राजस्थान के कई  जिलों (जैसलमेर, जोधपुर, नागौर, बीकानेर, अजमेर, झुंझनु, श्रीगंगानगर आदि) में ग्रामीण महिलाएं अब आक के पौधों से पोड्स तोड़ने, रेशे निकालने का काम कर रही हैं।
रुमा देवी फाउंडेशन गांव-गांव जाकर महिला स्वयं सहायता समूहों को प्रशिक्षण दे रही है। फाउंडेशन ने स्पष्ट अपील की है: केवल पूरी तरह पके हुए पोड्स ही तोड़ें तथा उन्हें जालीदार कट्टों में संग्रहित करें ताकि रेशों की गुणवत्ता बनी रहे व पौधे को नुकसान न पहुंचाएं।

पर्यावरण और अर्थव्यवस्था, दोनों को फायदा 

यह पहल पर्यावरण के अनुकूल भी है। आक का पौधा सूखा सहन करने वाला है और इसके रोपण से मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है। साथ ही, प्राकृतिक रेशों से बने उत्पादों की मांग बढ़ रही है क्योंकि ये हल्के, टिकाऊ और रासायनिक मुक्त हैं।
रुमा देवी कहती हैं,“जो आक कभी बेकार माना जाता था, वही आज गांवों में रोजगार, उम्मीद और कमाई की नई पहचान बन रहा है। हमारा लक्ष्य है कि रेगिस्तान के हर कोने में यह मॉडल पहुंचे और महिलाएं व किसान आत्मनिर्भर बनें।”

बढ़ती मांग और भविष्य की संभावनाएं 
फाउंडेशन के अनुसार, आक के रेशों से बने उत्पादों की बाजार में अच्छी मांग है। प्राकृतिक ऊन के विकल्प के रूप में ये उत्पाद हिमालयी क्षेत्रों, उत्तर भारत और निर्यात बाजार में भी जा सकते हैं। रूमादेवीफाउंडेशन 500 टन से अधिक रेशे एकत्रित करने की क्षमता विकसित कर चुका है और आगे विस्तार की योजना बना रहा है। यह पहल आत्मनिर्भर भारत और स्थानीय संसाधनों से स्थानीय विकास की दिशा में एक जीवंत उदाहरण है। 
जहां पारंपरिक खेती सूखे के कारण चुनौतीपूर्ण है, वहीं आक जैसी फसलों ने किसानों की सोच को पूरी तरह बदल दिया है। रूमादेवीफाउंडेशन की प्रवक्ता ने बताया कि जहां किसान निर्धारित की गई मात्रा में पोड्स एकत्रित कर लेते हैं वहां उनके खेत से ही माल उठाया जाता है जिससे उन्हे किसी प्रकार का परिवार व्यय नहीं उठाना पङता है। रुमा देवी ने बताया कि ये नवाचार साबित कर रहा है कि रेगिस्तान में भी समृद्धि संभव है — बस सही नजरिए और सामुदायिक प्रयास की जरूरत है।

What's Your Reaction?

like

dislike

love

funny

angry

sad

wow

SJK News Chief Editor (SJK News)