मार्ग और मंज़िल एक-दूसरे के पूरक : प्रज्ञासागर

धर्म को भी चाहिए समय और समर्पण

Jul 21, 2025 - 21:31
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मार्ग और मंज़िल एक-दूसरे के पूरक : प्रज्ञासागर

कोटा। गुरु आस्था परिवार कोटा के तत्वावधान में तथा सकल दिगंबर जैन समाज कोटा के आमंत्रण पर, तपोभूमि प्रणेता, पर्यावरण संरक्षक एवं सुविख्यात आचार्य प्रज्ञासागर मुनिराज का 37वां चातुर्मास महावीर नगर प्रथम स्थित प्रज्ञालोक में विराजमान है ।

गुरुदेव प्रज्ञासागर महाराज ने सभा सम्बोधन में कहा कि जब भी आप इस धार्मिक मेले में आएं, तो कुछ न कुछ अवश्य लेकर जाएं। जैसे व्यक्ति किसी मेला या बाजार से खाली हाथ नहीं लौटता, वैसे ही प्रज्ञालोक जैसे आध्यात्मिक स्थल से भी आत्मिक लाभ लेकर ही लौटना।

गुरुदेव ने कहा कि यदि कुछ बड़ा संकल्प नहीं कर सकते, तो कम से कम अनावश्यक वस्तुओं के त्याग का नियम लेकर जाएं। यही त्याग एक दिन आत्मिक उन्नयन का आधार बनता है। धर्म केवल मांगने का नहीं, देने और जीने का विषय है।

धर्म को भी चाहिए समय और समर्पण

आचार्य प्रज्ञासागर जी ने वर्तमान समय की धार्मिक उपेक्षा पर चिंता जताते हुए कहा कि व्यक्ति मंदिर में केवल एक रुपया और कुछ मिनट देकर करोड़ों की कामना करता है। यदि व्यवसाय में आप केवल कुछ समय लगाएं, तो क्या उससे आजीविका चल सकती है? फिर धर्म से सब कुछ पाने की अपेक्षा, बिना समर्पण के कैसे संभव है?

उन्होंने स्पष्ट किया कि सुख, शांति और आत्मिक संतोष तभी मिलते हैं जब व्यक्ति धर्म को नियमित समय देता है सामायिक, ध्यान और स्वाध्याय को नियमित व निरंतर करता है।

अपने संदेश के अंतिम भाग में आचार्यश्री ने जीवन के उद्देश्य और साधना की दिशा पर प्रकाश डालते हुए कहा केवल मंज़िल का जाप करने से कुछ नहीं मिलेगा। मंज़िल तभी मिलेगी जब व्यक्ति मार्ग पर चले। यदि मंज़िल का ज्ञान नहीं है, तो आप किसी भी रास्ते पर भटक सकते हैं। और यदि मंज़िल ज्ञात है, फिर भी यदि आप चलते नहीं, तो भी लक्ष्य सधने वाला नहीं।उन्होंने ज़ोर देते हुए कहा कि मंज़िल और मार्ग एक-दूसरे के पूरक हैं, और इसी समन्वय में ही जीवन की सफलता निहित है।

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SJK News Chief Editor (SJK News)