बोलने का अंदाज बदलो जीवन के सारे काम सफल हो जाएंगे : राष्टसंत पुलक सागर
आदमी जीते जी स्वर्ग जैसी जिंदगी जीता है, तो उसे अवश्य स्वर्ग मिलेगा, लेकिन जो जीते जी नरक जैसी जिंदगी जीता है, उसे कभी स्वर्ग की प्राप्ति नहीं हो सकती ।
उदयपुर । सर्वऋतु विलास स्थित महावीर दिगम्बर जैन मंदिर में राष्ट्रसंत आचार्यश्री पुलक सागर महाराज ससंघ का चातुर्मास भव्यता के साथ संपादित हो रहा है। जनसभा को संबोधित करते हुए कहा कि ज्ञान गंगा का पहला दिन है , किसी ने मुझसे पूछा- ज्ञान गंगा महोत्सव क्या होता है, मैने कहा ज्ञान गंगा में यदि कौआ स्नान करें तो हंस हो जाता है, और हंस स्नान करें तो परमहंस बन जाता है। एक हिमालय से गंगा निकली है और एक गंगा संत के अंदर से निकलती है। गंगा भी छोटी सी लकीर के रूप में निकलती है, और अंत में वह गंगा सागर का रूप ले लेती है, उसी तरह पुलक सागर की इस ज्ञान की गंगा में इतना डूबना सीखे कि लोगों से मीठा बोलना सिख जाएं। जिंदगी को जीना सीखे।
इंसान को इंसान बनाने की फैक्ट्री लगाई है, जिसमें 27 दिनों तक जीवन को परिवर्तन करने का प्रयास में करूंगा । स्वर्ग की तलाश में रहोगे तो स्वर्ग नहीं मिलेगा, लेकिन जो आदमी जीते जी स्वर्ग जैसी जिंदगी जीता है, तो उसे अवश्य स्वर्ग मिलेगा, लेकिन जो जीते जी नरक जैसी जिंदगी जीता है, उसे कभी स्वर्ग की प्राप्ति नहीं हो सकती ।
आचार्य ने कहा कि एक शिक्षक ने कहां कौन स्वर्ग जाना चाहता है, सभी बच्चों ने हाथ उठाया, एक बच्चे ने नहीं उठाया। तो उसको पूछा सभी स्वर्ग जाना चाहते है तुम नहीं ऐसा क्यों? तो बच्चे ने कहां कि मैं धरती पर स्वर्ग उतारना चाहता हूं, वह बालक था नरेंद्र और जो आगे जाकर स्वामी विवेकानंद बन जाया करता है । आदमी का सबसे पहला परिचय उसके चेहरे से होता है, लेकिन चेहरे का परिचय अधूरा होता है, लेकिन चेहरे का परिचय तब पूरा होता है, जब आदमी बोलता है, आदमी की वाणी सुन्दर होनी चाहिए, तो उस चेहरे की सुंदरता बढ़ जाती है। यदि सुंदर चेहरा अच्छी वाणी नहीं बोले तो उसकी सुंदरता का कोई मतलब नहीं है। आप कितने भी बड़े पद पर पहुंच जाएं, और कितनी भी डिग्री हासिल कर लें, लेकिन आप मीठा नहीं बोल सकते, तो आपका पढ़ा लिखा होने का कोई मतलब नहीं है।
अनपढ़ वो नहीं होता जो स्कूल नहीं जाता, अनपढ़ वो होता है जो पढ़ा लिखा होकर भी किसी से मीठी वाणी नहीं बोलता । आदमी इतना आजकल बिना बात के बहुत बोलने लग गया, लेकिन क्या बोलना, कितना बोलना है ये पता नहीं। डेढ़ साल में बच्चा बोलना सीख जाता है, लेकिन क्या बोलना है ये समझने में 100 साल की उम्र भी कम पड़ जाती है। जीभ एक है उसके काम दो है जीभ का काम चखना भी है और बकना भी है, जीभ खाती तो मीठा मीठा है, और बोलती कड़वा कड़वा है। कम बोलो, थोड़ा बोलो, वचन मीठा रखो ।
आचार्य ने कहा कि कौआ किसी को कुछ देता है क्या ? लेकिन कोयल मीठा बोलकर सभी के मन को मोहित कर देती है। जो आदमी ईंट का जवाब पत्थर से देता है वह आदमी कभी स्वर्ग का अनुभव नहीं कर सकता है, जो आदमी ईंट का जवाब फूल से देता है वह आदमी जीते जी स्वर्ग का अनुभव करता है । घर पर भी मां बाप अपने बच्चों से अच्छी और मीठी भाषा का प्रयोग करें, यदि किसी डॉक्टर के पास जाए और वह रिपोर्ट देखकर कहे कि तुम्हारे जाने का समय आ गया है और एक डॉक्टर कह रहा है कि तुम्हें कुछ नहीं होगा, मैं हूं ना । सांत्वना से डॉक्टर ने मीठे शब्द बोले तो मरीज भी आधा स्वस्थ हो गया । सब दुनियां में बोलने का ही खेल है। धागा और जुबान जितनी लंबी होगी उतना उलझेगी, धागे को लपेट को रखो और जुबान को जुबान को समेट कर रखो, तो तुम्हारा जीवन सफल हो जाएगा ।
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