श्रमण संस्कृति साधना के बिना भारतीय संस्कृति की कल्पना नहीं
गौरवमयी श्रमण परंपरा में परम पूज्य आचार्य श्री वर्द्धमानसागर जी महाराज का अहम योगदान है। हम सभी का परम सौभाग्य है कि परम पूज्य चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की महान परंपरा के पट्टाचार्य का दर्शन लाभ प्राप्त हो रहा है। भगवान आदिनाथ से लेकर भगवान महावीर तक के सिद्धांतों- शिक्षाओं को जन -जन तक पहुंचा कर इस दीक्षा को सार्थक किया । आचार्य श्री ंने का जीवन सभी भिक्षुओं, शिष्यों और अनुयायियों के लिए एक प्रकाश स्तंभ था। उन्होंने दिगंबर परंपराओं का पुनर्जन्म किया।
जयपुर (लोकेश कुमार जैन : 20वीं सदी के प्रथमाचार्य थे आचार्य शांतिसागर महाराज जिन्होंने अपने तप और साधना के प्रभाव से देश में जैन संतों और मुनि परंपरा को एक नया आयाम दिया। उन्होंने 35 वर्ष के साधनाकाल में 9 हजार 338 उपवास किए थे, जो 27 वर्ष के समय में किए जा सकते हैं। उनकी साधना ही मुनियों को साहस प्रदान करती है। आचार्य शांति सागर महाराज नहीं होते तो मुनि परंपरा का पालन करने वाले साधकों को नया रास्ता कौन दिखाता। अंग्रेजों से उन्होंने अपनी साधना के बल पर लोहा लिया और वह अपनी साधना से डिगे नहीं। दिगंबरत्व के प्रति उनकी यही साधना उन्हें महान बनाती है।
आचार्यश्री शांतिसागर महाराज कहते थे कि हिंसा करना महापाप है। धर्म का प्राण और जीवन-सर्वस्व अहिंसा धर्म ही है। सत्ता किसी की भी हो, शासन किसी का भी हो, उसे अहिंसा धर्म को नहीं भूलना चाहिए। इसके द्वारा ही सच्चा कल्याण होता है। आचार्य श्री के अनुसार, कुछ लोग यह सोचते हैं कि जैनधर्म में तो सांप-बिच्छू तक मारना मना है, अगर हम इस हद तक अहिंसा का पालन करते हैं तो राज्य कैसे चल सकेगा। इसके जवाब में उनका कहना था कि जैनधर्म में सर्वदा संकल्पीहिंसा न करने को कहा गया है। गृहस्थ विरोधी हिंसा नहीं छोड़ सकता। जैनधर्म के धारक मंडलेश्वर, महामंडलेश्वर आदि बड़े-बड़े राजा हुए हैं। गृहस्थ के घर में चोर घुस आए या कोई उस पर हमला कर दे तो वह उन्हें नहीं मारेगा, वह अपना बचाव करेगा, बिल्कुल करेगा। दरअसल जैन धर्म में निरपराधी जीव की हिंसा नहीं है। जैनधर्म का पालन करने वाला मांस नहीं खाएगा। वह शिकार नहीं खेलेगा। इस प्रकार निरपराधी जीव की रक्षा करते हुए और संकल्पी हिंसा का त्याग करते हुए जैन नरेश अहिंसा धर्म की प्रतिष्ठा स्थापित करता है। महाराज श्री के अनुसार, श्रावकों के अष्टमूलगुणों में यही अहिंसा का भाव है। यदि किसी को भी अपना कल्याण करना है तो जिनवाणी और आत्मा पर विश्वास रखना चाहिए।
दिगम्बर मुनि परम्परा को अपने दृढ़ चरित्र एवं संकल्प से पुर्नजीवित किया
19 शताब्दी में अंग्रेज आंक्राताओं के कारण दिगम्बर मुनि परम्परा लगभग लुप्त हो चुकी थी। कर्नाटक के बेलगांव में जन्मे सातगोडा पाटिल 1913 में छुल्लक दीक्षा एवं 1920 में दिगम्बर मुनि दीक्षा प्राप्त कर शांतिसागर नाम प्राप्त किया। आचार्य शांतिसागर महाराज ने अत्यन्त विपरित परिस्थितियों में भी बुझे हुए दीपक के समान दिगम्बर मुनि परम्परा को अपने दृढ़ चरित्र एवं संकल्प से पुर्नजीवित किया। गहन अंधकार के कारण जब जनमानस मार्ग से भटकने लगा तब आचार्य ने सूर्य की प्रखर किरणों के समान उस अंधकार को समाप्त किया। बीसवीं सदी के प्रथम दिगम्बर जैनाचार्य के रूप में जैन समाज ने जिस सूर्य का प्रकाश प्राप्त किया उसने सम्पूर्ण धरा का अंधकार समाप्त कर एक बार फिर से भगवान महावीर के युग का स्मरण कराया था वह थे श्रमण जगत में महामुनींद्र, चारित्र चक्रवर्ती, आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज। उन्होंने णमोकार महामंत्र का णमो आइरियाणं ये पद आदर्श रूप से भूषित किया है। अपने तप, त्याग और संयम पालन द्वारा मुनिचर्या का आगमोक्त मार्ग बताया। उनका जीवन महान पथ प्रदर्शक के रूप में था । वर्तमान में जो हमारी श्रमण परंपरा विद्यमान है, वे इन्हीं आचार्यश्री की कृपा से है।
जैन आगम के परिप्रेक्ष्य में समाज को सुधारने हेतु आचार्यश्री द्वारा उठाये गये कदम अत्यंत साहसिक एवं आर्ष परम्परावादी रहे। आचार्यश्री ने जहां जैनधर्म और संस्कृति के वास्तविक पथ को पुनर्स्थापित किया वहीं उन्होंने समाज की कतिपय कुरीतियों पर भी अपना ध्यन आकर्षित कर उनके जड़मूल समापन का सफल प्रयास किया। अंग्रेजों के शासनकाल में आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज एक ऐसे जैन मुनि हुए जिन्होंने अपने दिगम्बरत्व से जैनधर्म की भी विश्वव्यापी पताका फहरायी और भविष्य के लिए इस धर्म की नींव अत्यंत मजबूत बना दी। कर्नाटक के भोज में सन 1872 में जन्में बालक सातगौड़ा ने यरनाल में मुनिदीक्षा ग्रहण कर सन 1924 समडौली में आचार्य पद प्राप्त किया था। संपूर्ण देशभर में पद विहार कर उन्होंने बीसवी सदी में दिगम्बरत्व के विस्तार व जैनत्व के उन्नयन के लिए अनेकों कार्य किये । वर्तमान में 1600 से अधिक पिच्छीधारी संत उनका स्मरण कर मोक्षमार्ग पर अग्रसर हैं श्रमण संस्कृति साधना के बिना भारतीय संस्कृति की कल्पना नहीं । उनकी पट्ट परम्परा के पंचम पट्टाधीश आचार्य के रूप में आचार्यश्री वर्धमानसागरजी विगत 1990 से उक्त पद पर शोभायमान हैं ।
आचार्य श्री वर्द्धमानसागर जी महाराज की प्रेरणा व सान्निध्य में आचार्य श्री शांति सागर जी का मुनि दीक्षा शताब्दी (वर्ष 2019-20 ) महोत्सव मुनि दीक्षा स्थली यरनाल (कर्नाटक) में हर्षोल्लास पूर्वक मनाया था। ऐसे महान आचार्य का आचार्य पद का शताब्दी वर्ष मनाने का भी शुभ प्रसंग हमारे बीच आ गया है। जिसका उदघाटन पारसोला राजस्थान में परम पूज्य चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की परंपरा के पट्टाचार्य वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी महाराज ससंघ के सान्निध्य में अक्टूबर 2024 में त्रिदिवसीय आयोजन के माध्यम से हो चुका है। शताब्दी समारोह की सर्वप्रथम अपने मुखार बिंद से घोषणा विजयनगर (अजमेर) में आचार्यश्री वर्द्धमान सागर जी महाराज ने की थी।
आचार्य पद प्रतिष्ठापन के 100वें वर्ष को आचार्य पद प्रतिष्ठापना शताब्दी महोत्सव के रूप में 2024-25 में भव्य विशाल स्तर पर वैचारिक आयामों के साथ संस्कृति संवर्धन, सामाजिक सरोकार के बहुउद्देशीय पंचसूत्री कार्यक्रमों के साथ मनाया जाएगा। महोत्सव के आयोजन के लिए विस्तृत रूपरेखा व कमेटी गठन के लिए परम्परा के पट्टाधीश राष्ट्रगौरव, वात्सल्यवारिधि आचार्य 108 श्री वर्धमानसागरजी महाराज ससंघ के सान्निध्य में आचार्यश्री वर्द्धमान सागर जी महाराज का कहना है कि उनका गुणगान करने उनके कार्यों को जन-जन तक पहुंचाने के लिए आचार्य पद प्रतिष्ठापन शताब्दी महोत्सव संस्कृति संरक्षण व सामाजिक सरोकार का माध्यम बनेगा।
अपने पूर्वजों के उपकारों को याद रखने वाले श्रावक अपने कर्तव्यों का सही पालन करते हैं। जिनकी कृपा प्रसाद से समाज, संस्कृति, श्रमण संस्कृति धर्म और वंश का संरक्षण और पोषण होता है उनके गुणों का गुणगान करना हमारा दायित्व है। जैन समाज एवं धर्म के वर्तमान इतिहास पर यदि दृष्टिपात करें तो बीसवी सदी के प्रथम आचार्य के रूप में जन्में चारित्र चक्रवर्ती श्री शांतिसागर जी महाराज के समाज पर अनंत उपकार हैं। हम सभी का परम सौभाग्य है कि ऐसे चारित्र चक्रवर्ती आचार्य शांतिसागरजी का आचार्य पद प्रतिष्ठापन शताब्दी महोत्सव संपूर्ण देश में मनाने का अवसर प्राप्त होने जा रहा है, हम सभी अभी से इसके लिए संकल्पित हों।
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