भूगर्भ जिनालय के दर्शन पाकर मंदिर बनवाने की प्रेरणा जाग्रत हुई
सोभाग्य बुला रहा चितामणि पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर, पारस विहार, मुहाना मंडी। तीर्थ से कम नहीं: चिंतामणि पाश्व॑नाथ मंदिर की अद्भुत छटा" स्वेच्छा से साधर्मी स्वभावों से जुड़ता, समाज को संगठित करता अतिशय मंदिर"
जयपुर:भारत भूमि सदा से धर्म, संस्कृति और अध्यात्म की धरोहर रही है। यहाँ की मिट्टी में भक्ति, श्रद्धा और आस्था का भाव सहज ही समाया हुआ है। इसी भाव का सजीव उदाहरण है चिंतामणि पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर, जो जयपुर की गुलाबी नगरी में मानसरोवर विस्तार के समीप पारस विहार, मुहाना मंडी क्षेत्र में स्थित है।
दर्शन पाकर भावना जाग्रत हुई
सांगानेर भूगर्भ यक्ष रक्षित जिनालय दर्शन हेतु 1971 में आचार्य देशभूषण जी महाराज ने चैत्यालय को दर्शनाथ हेतू बाहर लाए थे स्व. श्री कुंदन मल जी गोदिका आचार्य श्री 108 देशभूषण जी महाराज के साथ नीचे तलघर में गए थे जहां तक गुरूवर की आज्ञा थी। पवन जी गोदिका ने बताया हमारे पूज्य पिताजी स्व. श्री कुंदन मल जी गोदिका ने आचार्य श्री 108 देशभूषण जी महाराज भूगर्भ स्थित यक्ष रक्षित चैत्यालय को तीन दिन के लिए निकाल कर लाये थे जो की सभी दर्शनार्थियों ने दर्शन कर पुण्य प्राप्त किया साथ ही भूगर्भ स्थित यक्ष रक्षित चैत्यालय के दर्शन पाकर स्व. श्री कुंदन मल जी गोदिका ने प्रभु की असीम कृपा का भागीदार समझा तभी से मन में भाव जाग्रत हुआ की जिनेन्द्र की भक्ति कृपा बरस ही गयी तो क्यू ना हो की में भी एक मंदिर का निर्माण करू मंदिर निर्माण।
मंदिर का नक्शा मुनि पुगंव श्री 108 सुधा सागर जी मुनिराज के परम भक्त एवं श्रमण संस्कृति संस्थान में उप- अधिष्ठाता पर कार्यरत श्री राजमल जी बेगस्या जी की सहभागिता में सुधासागर जी मुनिराज के दिशा-र्निदेशन में बापु नगर जयपुर निवासी श्री एच. के. शर्मा के द्वारा बनाया गया।
जिनालय र्निमाण हेतु भुमि पुजन दिनांक 22.8.2010 को मुनिपुगंव 108 श्री सुधासागर जी पावन आशीर्वाद से बाल ब्रह्मचारी प्रदीप भैया के सानिध्य में किया गया।
बालाचार्य श्री 108 सिद्धसेन मुनिराज के सानिध्य में 15 नवम्बर 2013 से 17 नवम्बर तक मुलनायक 300 वर्ष प्राचीन पाश्व॑नाथ भगवान की पाषाण प्रतीमा को वेदी में विराजमान करने हेतु वेदी प्रतिष्ठा महोत्सव का आयोजन प्रतिषठाचार्य निर्मल जी बोहरा के द्वारा सम्पन्न करवाया गया।
आचार्य श्री 108 विशद् सागर जी मुनिराज के सानिध्य में मुल वेदी के दायी और की वेदी में आदिनाथ भगवान एवं बायी और की वेदी 108 फन की पाश्व॑नाथ भगवान को विराजमान करने हेतु लघु पंच्चकल्याणक एवं विश्व शान्ति महायक्ष दिनांक 28नवम्बर से 30 नवम्बर 2015 में प्रतिष्ठाचार्य श्री विमल चंद जी बनेठा द्वारा सम्पन्न करवाया गया।
परम पुज्य आचार्य श्री 108 शशांक सागर जी मुनिराज का 35 वां अवतरण समारोह बडे़ हर्षोल्लास के साथ मनाया गया।
परम पुज्य आचार्य श्री विमल सागर जी के अंतिम शिक्षित उपाध्याय 108 श्री उर्जयंत सागर जी मुनिराज के सानिध्य में फाल्गुन माह 2023 की अष्ठानिका में सिद्धचक्र महामंडल विधान प्रतिष्ठाचार्य श्री सुरेन्द्र जी सल्मबुर, उदयपुर वालों के द्वारा बड़ी धुमधाम एवं हर्षोल्लास के साथ साआनंद सम्पन्न करवाया।
महामना, महातपस्वी, महर्षि आचार्य श्री 108 कुशाग्र नंदी जी गुरुदेव भगवन ने वर्षायोग चातुर्मास 2019 एवं COVID 19 में वर्षायोग 2020 पारस विहार पाश्व॑नाथ दिगंबर जैन मंदिर, मोहनपुरा, मुहाना मंडी, वर्षायोग चातुर्मास 2021 का किर्ति नगर पाश्व॑नाथ दिगंबर जैन मंदिर, टोंक रोड, सम्पन्न हुआ, आचार्य श्री कुशाग्र नंदी जी का पारस विहार जैन मंदिर में लगभग 27 माह का र्निविघ्न्न प्रवास रहा।
महामना, महातपशिरोमणी, महर्षि आचार्य श्री कुशाग्र नंदी जी के आशीर्वाद से यह मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का भी महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है। लगभग 300 वर्ष प्राचीन पाश्व॑नाथ भगवान (अहिक्षैत्र के पाश्व॑नाथ भगवान जैसी छवि साधर्मी बंधुओं को दर्शन लाभ लेते समय महसूस होती है) काले पाषाण की प्रतिमा के दर्शन और पूजा का सौभाग्य पाने हेतु प्रतिदिन श्रद्धालु यहाँ पहुँचते हैं और पुण्य संचय करते हैं।
प्रतिदिन की धार्मिक दिनचर्या
मंदिर में भक्तों के लिए नित्यनियम पूजा-विधान की व्यवस्थित व्यवस्था की गई है।
प्रातः 7:15 बजे – अभिषेक
प्रातः 7:30 बजे – शान्तिधारा एवं तत्पश्चात नित्य पूजा
सायंकाल 7:15 बजे – आरती
प्रतिदिन सामूहिक रूप से साधर्मी बंधु एकत्र होकर अभिषेक, शान्तिधारा और पूजा करते हैं। विशेष अवसरों पर तो यहाँ श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ती है और वातावरण मंगलमय हो उठता है।
साधर्मी बंधुओं की सहभागिता
आस-पास की कालोनियों तथा जयपुर के विभिन्न क्षेत्रों से श्रद्धालु बंधु प्रतिदिन मंदिर आकर पार्श्वनाथ प्रभु की पूजा-अर्चना करते हैं। “एक वृक्ष माँ के नाम” की भावना जिस प्रकार हरियाली का संदेश देती है, उसी तरह मंदिर का संदेश है – “एक अभिषेक, शांति धारा प्रभु के नाम।” यहाँ श्रद्धालु जन्मदिन, विवाह वर्षगांठ, पुण्यतिथि आदि अवसरों पर विशेष पूजा-अभिषेक करवाकर पुण्य संचय करते हैं।
एशिया की सबसे बड़ी कॉलोनी मानसरोवर के निकट स्थित यह मंदिर न केवल जयपुर, बल्कि पूरे राजस्थान और अन्य दिल्ली, इलाहाबाद,उदयपुर, महाराष्ट्र, कर्नाटक, राज्यों से आने वाले भक्तों की आस्था को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है।
समाज को जोड़ने का माध्यम : पवन कुमार -सरोज, प्रतीक- रुचि गोदिका, आध्या, मानवी
पूजा अभिषेक का धर्म के प्रति जुड़ाव का महत्व हे पवन गोदिका ने बताया कि हमारा एक ही उद्देश्य समाज का हर युवावर्ग निस्वार्थ भावना से समाज की सेवा एवं धर्म के प्रति जागरूक हो और धार्मिक क्रियाओं से जुड़ाव रहे सभी का 1008 चिंतामणी पार्श्वनाथ मंदिर केवल धार्मिक आस्था का स्थल ही नहीं, बल्कि समाज को संगठित करने का माध्यम भी है। यहाँ साधर्मी बंधु आपसी सौहार्द्र के साथ मिलकर पूजा करते हैं। युवा वर्ग को धार्मिक संस्कारों से जोड़ने का प्रयास किया जाता है। समाज के हर वर्ग को साथ लेकर चलने का संदेश दिया जाता है।
आध्यात्मिक अनुभव
जब भक्त पार्श्वनाथ प्रभु के सम्मुख बैठकर अभिषेक, शांति धारा और पूजन करते हैं, तब उनका हृदय शांति, सौभाग्य और संतोष से भर जाता है। मंदिर का शांत वातावरण मन को एकाग्र करता है और आत्मा को परम सुख की अनुभूति कराता है।
चिंतामणि पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर आस्था, भक्ति और साधर्मी भावों का संगम है। यह स्थान हर भक्त को प्रेरणा देता है कि जीवन का सच्चा सौंदर्य दान, धर्म और भक्ति में ही है। जयपुर ही नहीं, बल्कि पूरे भारत के लिए यह मंदिर पुण्य संचय और सौभाग्य का धाम है।
मंदिर की भव्यता और सुविधाएँ
3166.66 वर्गगज के विशाल क्षेत्र में फैला यह मंदिर परिसर श्रद्धालुओं के लिए संपूर्ण सुविधाओं से युक्त है।
विशाल मंदिर प्रांगण
बड़े कार्यक्रमों हेतु कवर्ड पंडाल (जहाँ लगभग 500 व्यक्ति वात्सल्य भोज का आनंद ले सकते हैं) भोजन बनाने हेतु सुव्यवस्थित रसोई स्थान
पर्याप्त पार्किंग स्थल प्रदूषण रहित शांत वातावरण
यहाँ समय-समय पर पूजा-विधान गोष्ठियाँ, जन्मदिन समारोह, विवाह आदि सामाजिक आयोजन भी किए जाते हैं। मंदिर आने वाले हर साधर्मी को यहाँ की शांति, सुंदरता और व्यवस्थाएँ यादगार अनुभव कराती हैं।
साधर्मी भावों का सम्मान
श्री कुंदनमल कमला देवी चैरिटेबल ट्रस्ट की विशेषता यही है कि यहाँ साधर्मी बंधुओं के भावों को सर्वोपरि रखा जाता है। चाहे श्रद्धालु अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान करें या नि:शुल्क सेवाओं का लाभ लें, मंदिर में सबको समान सम्मान मिलता है। यही कारण है कि यह स्थान साधर्मियों के लिए मात्र एक मंदिर नहीं, बल्कि तीर्थ से कम नहीं।
जैसे-जैसे समाज के लोग यहाँ दर्शन-पूजन के लिए आ रहे हैं, वैसे-वैसे यह मंदिर “गुलाबी नगरी का आध्यात्मिक नवरत्न” बनता जा रहा है।
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