कर्मों से मिलता है पुण्य और पाप:आचार्यश्री वर्धमान सागर जी
भौतिक युग में व्यसन, फैशन, दूषित खानपान, रहन-सहन, वेशभूषा का देव शास्त्र और गुरु के समक्ष ध्यान रखना जरुरी
टोंक परम पूज्य राष्ट्रगौरव वात्सल्य वारिधि आचार्यश्री 108 वर्धमानसागर जी महाराज ने धर्म सभा सम्बोधन में कहा कि आज वर्तमान भौतिक युग में व्यसन, फैशन, दूषित खानपान, रहन-सहन, वेशभूषा का देव शास्त्र और गुरु के समक्ष ध्यान रखना जरुरी है। जैन धर्म का प्रमुख सिद्धांत प्रतिदिन देव दर्शन करना, पानी छानकर पीना और रात्रि भोजन नहीं करना है। भगवान की वाणी का उल्लंघन करने से पुण्य नहीं मिलता है, मनुष्य दुखी रहते हैं। जीवन की सार्थकता तभी होगी, जब आपका खानपान रहन-सहन, वेशभूषा और भगवान के प्रति विनय होगा। सम्मान मनुष्य धर्म धारण करने से मिलता है, धर्म आपको सम्मानित कराता है। तीर्थ स्वयं बनते हैं बनाएं नहीं जाते हैं।
आचार्यश्री ने कहां कि शास्त्रों की वाणी मानने वाले परम भक्त होते हैं आपके द्वारा किए जाने वाले कार्यों से पुण्य और पाप मिलता है। धर्म और सुख किसी दुकान पर नहीं मिलता है। आचार्य श्री के प्रवचन के पूर्व मुनि श्री प्रभव सागर जी ने कहा कि भगवान के दर्शन अभिषेक पूजन जैसे द्रव्यों और जिस भाव से करते हैं उस अनुसार फल पुण्य या पाप सुख या दुख अर्जित होता है।
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