हिंदुओं से अलग नहीं है जैन समाज: आचार्य श्री जिनमणिप्रभ सूरीश्वर

भारत की परंपरा में मूल सत्य शाश्वत और सर्वमान्य: भागवत

Mar 6, 2026 - 20:10
 0  3
हिंदुओं से अलग नहीं है जैन समाज: आचार्य श्री जिनमणिप्रभ सूरीश्वर
हिंदुओं से अलग नहीं है जैन समाज: आचार्य श्री जिनमणिप्रभ सूरीश्वर

जैसलमेर : चादर महोत्सव का शुभारंभ शुक्रवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने किया । कार्यक्रम के दौरान उन्होंने दादा गुरुदेव की स्मृति में जारी किए गए स्मारक सिक्के और विशेष डाक टिकट का लोकार्पण किया । साथ ही 'दादा गुरुदेव' नामक पुस्तक का भी विमोचन किया गया ।इससे पहले डॉ. भागवत ऐतिहासिक जैसलमेर किले के देशहरा चौक पहुंचे । यहां से वे ई-रिक्शा के माध्यम से किले में स्थित पार्श्वनाथ जैन मंदिर पहुंचे । मंदिर में प्रवेश करने के बाद वे मूल गर्भगृह तक गए और श्री पार्श्वनाथ भगवान के दर्शन कर आशीर्वाद लिया । इसके बाद वे मंदिर परिसर में स्थित जिनभद्र सूरी ज्ञान भंडार पहुंचे, जहां उन्होंने दादा गुरुदेव की पावन चादर सहित अन्य ऐतिहासिक धरोहरों का अवलोकन किया । इस अवसर पर श्री जैसलमेर लोद्रवपुर पार्श्वनाथ जैन श्वेतांबर ट्रस्ट की ओर से उनका सम्मान किया गया । साथ ही उन्होंने ट्रस्ट की अनुभव पंजिका में अपने विचार भी दर्ज किए ।


हिंदुओं से अलग नहीं है जैन समाज: आचार्य श्री जिनमणिप्रभ सूरीश्वर

 धर्मसभा में आचार्य श्री जिनमणिप्रभ सूरीश्वर ने कहा कि जैन समाज को हिंदू समाज से अलग मानने की भूल नहीं करनी चाहिए । उन्होंने कहा कि हिंदुस्तान में रहने वाले सभी लोगों की सांस्कृतिक जड़ें एक हैं । दादा गुरुदेव की चादर का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि हम तिनके के समान हैं और दादा गुरुदेव जिनदत्त सूरी जी महाराज की चादर बहती हुई नदी की तरह है । तिनका स्वयं समुद्र तक नहीं पहुंच सकता, लेकिन नदी के सहारे वह अपने लक्ष्य तक पहुंच जाता है । उसी प्रकार परमात्मा तक पहुंचने का मार्ग दादा गुरुदेव की चादर से जुड़ी आस्था से मिलता है । उन्होंने आगे कहा कि भारत में विभिन्न धर्मों और परंपराओं के बावजूद खान-पान, त्योहार और संस्कृति में गहरा साम्य दिखाई देता है, इसलिए समाज में मतभेद की कोई जगह नहीं होनी चाहिए । यदि कहीं विवाद हैं तो उन्हें समाप्त करने की दिशा में प्रयास करना चाहिए । सभी धर्मों के संतों को मिलकर युवाओं को जीवन की सही दिशा देने का संकल्प लेना चाहिए, ताकि नई पीढ़ी के सामने एक सकारात्मक उदाहरण प्रस्तुत किया जा सके ।

भारत की परंपरा में मूल सत्य शाश्वत और सर्वमान्य: भागवत
धर्मसभा में अपने संबोधन में डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि दादा गुरुदेव की चादर हमें उनके द्वारा समाज के लिए किए गए महान कार्यों की याद दिलाती है । उन्होंने कहा कि यह चादर वर्षों से सुरक्षित है और इसे न आग जला सकी, न शस्त्र काट सका और न ही पानी इसे भिगो सका । यह आस्था और भारतीय संस्कृति के चमत्कार का प्रतीक है । उन्होंने आगे कहा कि भारत की परंपरा में मूल सत्य शाश्वत और सर्वमान्य है ।
श्रमण और ब्राह्मण परंपराओं के रूप में ज्ञान की दो धाराएं अवश्य चलीं, लेकिन उनका उद्देश्य एक ही रहा । विभिन्न संप्रदायों के बावजूद सबका मूल तत्व एक ही चेतना है और परमात्मा भी एक ही है । भागवत ने जैन दर्शन के अनेकांतवाद की व्याख्या करते हुए कहा कि प्रत्येक व्यक्ति दुनिया को अपने-अपने दृष्टिकोण से देखता है । उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि मनुष्य सात रंगों को देख सकता है, लेकिन कुछ जीवों की दृष्टि सीमित होती है । कुत्ते को केवल दो रंग दिखाई देते हैं, जबकि मुर्गी तीन रंगों को पहचानती है । ऐसे में दोनों के लिए दुनिया का वर्णन अलग-अलग होगा, जबकि वास्तविकता एक ही है । यही विचार आगे चलकर जैन दर्शन में अनेकांतवाद के रूप में प्रकट होता है ।

महोत्सव की भव्यता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 7 मार्च को जैसलमेर से एक वैश्विक संदेश जाएगा । विश्वभर में करीब 1 करोड़ 8 लाख श्रद्धालु एक साथ 'दादागुरु इकतीसा' का सामूहिक पाठ करेंगे, जो अपने आप में एक विश्व रिकॉर्ड बनने जा रहा है । फिलहाल जैसलमेर में लगभग 400 संतों और 20 हजार से अधिक श्रद्धालुओं की उपस्थिति से पूरा शहर श्रद्धा और भक्ति के वातावरण में डूबा हुआ है ।

What's Your Reaction?

like

dislike

love

funny

angry

sad

wow

SJK News Chief Editor (SJK News)