भोग से मिलता है दुख: प्रज्ञान सागर
धर्मसभा में बोले - विषय भोग में डूबा मनुष्य पराई वस्तुओं को अपना मान बैठा
बूंदी : नैनवां स्थित शांति वीर धर्म स्थल पर जैन मुनि प्रज्ञान सागर महाराज ने सोमवार को धर्मसभा में संबोधित किया। उन्होंने कहा कि आजकल मनुष्य विषय भोग में डूब गया है। वह पराई वस्तुओं को भी अपना मान बैठा है। मुनि ने भोग की तुलना खुजली से की। उन्होंने कहा कि जैसे खुजली में खुजलाते-खुजलाते खून निकलने लगता है। फिर भी खुजली नहीं रुकती। इसी तरह भोग की तृष्णा भी कभी समाप्त नहीं होती।
मुनि ने महिलाओं द्वारा प्रयोग किए जाने वाले सौंदर्य प्रसाधनों पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि लाली, लिपस्टिक और शैंपू जैसे रासायनिक उत्पाद जीव हिंसा से बनते हैं। शैंपू बालों को कमजोर करता है और उनकी वृद्धि को रोकता है। एक उदाहरण दिया कि कुत्ते के हड्डी चबाते समय अपने मुंह से निकले खून को हड्डी का रस समझकर चाटता रहता है। उन्होंने कहा कि आज मनुष्य की स्थिति भी ऐसी ही है। वह भोग को सुख मानकर उसके पीछे भाग रहा है।
पांचों इंद्रियों के भोग को दुख का कारण बताया। कहा कि आज के युग में लोग मोबाइल सुनने के लिए कानों में इयरफोन लगाते हैं। इससे कान के पर्दे कमजोर हो जाते हैं। एक दिन ऐसा आएगा जब सुनना ही बंद हो जाएगा। तब साधु के वचनों को सुनने का मार्ग भी बंद हो जाएगा।
मुनि ने कहा कि वस्तुओं का भोग साधु भी करते हैं, पर उनमें वासना नहीं होती। साधु वस्तु के पीछे आसक्त नहीं होते। मनुष्य भोग को ही सुख मानकर उसके पीछे दौड़ रहा है। अगर भोग में सुख होता तो संत अपना परिवार, घर, कुटुंब छोड़कर त्याग का मार्ग नहीं अपनाते। भोग ही सबसे बड़ा दुख का कारण है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य जन्म से मृत्यु तक रोज भोग की वस्तुएं भोगता है, फिर भी तृप्त नहीं होता। अंतिम समय तक भी आत्मा का अहित करता है। मुनि ने बताया, जो वस्तु अपनी नहीं, उसे अपना मानना मोह है। यही अज्ञानता का कारण है। भगवान का दीप प्रज्वलन निर्मल कुमार अरिहंत, धीरज पाटनी परिवार द्वारा किया गया। समिति ने मुनि का तिलक, माला और दुपट्टा पहनाकर स्वागत किया।
मुनि प्रसिद्ध सागर महाराज ने कहा कि आत्मा को जीव कहते हैं। जिसमें चेतना, देखने, जानने, सुनने की शक्ति हो, वही जीव है। यह जीव चारों गतियों में भ्रमण करता है। जैसा कर्म करता है, वैसा फल भोगता है। कोई दूसरा उसके कर्मों को नहीं भोगता। पराई वस्तु को अपना मानना मोह है। देव, शास्त्र और गुरु के प्रति सच्ची श्रद्धा ही मोक्ष का मार्ग है।
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