ड्रेस नहीं, पाठ्य पुस्तकों में एकरूपता लाए सरकार

यूनिफॉर्म नीति से नहीं रुकेगी शिक्षा में लूट : संयुक्त अभिभावक संघ संघ ने कहा कि "राज्य सरकार अभिभावकों के सब्र की परीक्षा ना लेवें, अभिभावक केवल तब तक शांत है जब वह बिखरा हुआ है"

Apr 2, 2026 - 22:41
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ड्रेस नहीं, पाठ्य पुस्तकों में एकरूपता लाए सरकार

जयपुर। राजस्थान सरकार द्वारा शिक्षा मंत्री मदन दिलावर के माध्यम से सरकारी एवं निजी स्कूलों में एक समान यूनिफॉर्म लागू करने के प्रस्ताव पर संयुक्त अभिभावक संघ ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा है कि सरकार शिक्षा में वास्तविक सुधार के मूल मुद्दों से ध्यान भटकाकर “ड्रेस कोड” थोपने में लगी हुई है, जबकि प्रदेशभर के अभिभावक निजी स्कूलों की मनमानी पाठ्य पुस्तकों की खरीद-फरोख्त से त्रस्त हैं।

संयुक्त अभिभावक संघ के प्रदेश प्रवक्ता अभिषेक जैन बिट्टू ने कहा कि आज प्रदेश में सबसे बड़ा आर्थिक बोझ यूनिफॉर्म नहीं, बल्कि निजी स्कूलों द्वारा अनिवार्य करवाई जा रही महंगी और अनावश्यक पाठ्य पुस्तकों का है। राज्य सरकार और शिक्षा विभाग अभिभावकों के सब्र की परीक्षा बिल्कुल भी ना लें। अभिभावक तब तक शांत हैं जब तक वे बिखरे हुए हैं, लेकिन अब अभिभावक न केवल जागरूक हो रहे हैं बल्कि मुखर भी हो रहे हैं। सरकार और विभाग समय रहते चेत जाएं, अन्यथा गंभीर परिणाम देखने को मिल सकते हैं।

उन्होंने कहा कि प्रदेश के अधिकांश निजी स्कूलों में हर वर्ष नई किताबें बदल दी जाती हैं। व्यवसायिक लाभ के लिए विशेष प्रकाशकों से जुड़ी किताबें खरीदने के लिए बाध्य किया जाता है। जिन पाठ्य पुस्तकों का बाजार मूल्य ₹200–₹300 होता है, उन्हें स्कूलों के माध्यम से ₹800–₹1500 तक में बेचा जा रहा है, जिससे अभिभावकों को खुलेआम आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है।

संयुक्त अभिभावक संघ के अनुसार, एक विद्यार्थी की वार्षिक पुस्तकों पर औसतन ₹4000 से ₹12000 तक खर्च आ रहा है, जो यूनिफॉर्म के खर्च से कई गुना अधिक है। इसके बावजूद लाखों शिकायतें शिक्षा विभाग को दिए जाने के बाद भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो रही है।

संघ ने आरोप लगाया कि शिक्षा विभाग और मंत्री के संज्ञान में यह मामला हर वर्ष आता है, इसके बावजूद “नाक के नीचे” खुलेआम अभिभावकों की आर्थिक लूट जारी है। इस पर रोक लगाने के बजाय सरकार ड्रेस को एक समान करने जैसे सतही निर्णय लेकर अपनी जिम्मेदारी से बचने का प्रयास कर रही है।

संघ ने सवाल उठाया है कि—
1. जब पाठ्यक्रम और किताबें अलग-अलग हैं, तो शिक्षा में समानता कैसे संभव है?
2. क्या एक समान ड्रेस पहनाने से शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार हो जाएगा?
3. सरकार निजी स्कूलों को मनमानी किताबें बेचने से रोकने के लिए ठोस नीति क्यों नहीं बना रही?
4. सरकारी स्कूलों में एनसीईआरटी आधारित पाठ्य पुस्तकें अनिवार्य हैं, तो निजी स्कूलों में भी इन्हें लागू क्यों नहीं किया जा रहा?

संयुक्त अभिभावक संघ का स्पष्ट कहना है कि यदि सरकार वास्तव में सरकारी और निजी स्कूलों में समानता लाना चाहती है, तो सबसे पहले पाठ्य पुस्तकों और पाठ्यक्रम में एकरूपता लागू करनी चाहिए। इससे न केवल अभिभावकों पर आर्थिक बोझ कम होगा, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता और पारदर्शिता भी सुनिश्चित होगी।

प्रदेश प्रवक्ता अभिषेक जैन बिट्टू ने कहा: “सरकार शिक्षा में सुधार के नाम पर केवल दिखावटी कदम उठा रही है। यूनिफॉर्म एक जैसी कर देने से न तो शिक्षा समान होगी और न ही अभिभावकों की समस्याएं खत्म होंगी। आज सबसे बड़ा मुद्दा निजी स्कूलों की किताबों की खुली लूट है, जिस पर सरकार चुप है। अगर सरकार वास्तव में समानता चाहती है तो पहले पाठ्य पुस्तकों को एक समान करे, न कि ड्रेस को।”

संघ ने यह भी कहा कि ₹600 की यूनिफॉर्म सहायता एक अव्यावहारिक प्रावधान है, क्योंकि वर्तमान में सिलाई और कपड़े की लागत ही इससे अधिक है। ऐसे में यह निर्णय गरीब परिवारों को राहत देने के बजाय अतिरिक्त आर्थिक बोझ डालने वाला साबित होगा।

संयुक्त अभिभावक संघ ने राज्य सरकार से मांग की है कि—
1. निजी स्कूलों में पाठ्य पुस्तकों की मनमानी पर तत्काल रोक लगाई जाए
2. एक समान पाठ्यपुस्तक नीति लागू की जाए
3. यूनिफॉर्म की बजाय पाठ्य पुस्तकों की एक समानता पर प्राथमिकता से विचार किया जाए

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SJK News Chief Editor (SJK News)