लोभ कषाय सबसे बड़ा पाप है - आचार्य सुन्दर सागर महाराज
निवाई में भगवान पुष्पदंत जी का निर्वाण कल्याणक महोत्सव धूमधाम से मनाया
निवाई - सकल दिगम्बर जैन समाज के तत्वावधान में आचार्य सुन्दर सागर महाराज संध के सानिध्य में आयोजित दशलक्षण धर्म पर्व पर शनिवार को उत्तम शौच धर्म की गाजे बाजे के साथ विशेष पूजा अर्चना की गई जिसमें 200 श्रद्धालुओं ने भगवान पुष्पदंत जी का मोक्ष कल्याणक महोत्सव पर संगीत के द्वारा भक्तामर पाठ अनुष्ठान किया जिसमें श्रद्धालुओं ने 48 दीपकों को भजनो के साथ चढ़ाया एवं बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। चातुर्मास कमेटी के प्रवक्ता सुनील भाणजा एवं विमल जौंला ने बताया कि दशलक्षण पर्व कार्यक्रम में श्रद्धालुओं ने भगवान शांतिनाथ जी के समक्ष दीप प्रज्जवलित एवं चित्र अनावरण करके पूजा अर्चना का शुभारंभ किया। इस दौरान शनिवार को सुबह देव शास्त्र गुरु, तीर्थंकर भगवान पुष्पदंत जी की पूजा, सोलह कारण पूजा, दशलक्षण पर्व की पूजा एवं पंचमेरु जी की विधिवत मंत्रोच्चार द्वारा पूजा अर्चना की गई जिसमें सुनील एण्ड पार्टी ने भजनों की प्रस्तुतियां दी। जौंला ने बताया कि दशलक्षण धर्म के अन्तर्गत सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए गए जिसमें आचार्य शांतिसागर पाठशाला के बालक बालिकाओं ने जैन धार्मिक लव कुश की महिमा की लधु नाटिका प्रस्तुति दी गई। नाटिका का संचालन सीमा जैन ने किया। इस नाटिका में चयनित पात्रों का अभिनन्दन किया गया। इस दौरान कार्यक्रम के मुख्य अतिथि विनोद कुमार, सत्यनारायण, गिर्राज प्रसाद, एवं महेश कुमार जैन मोठूका परिवार ने लधु नाटिका का फीता काटकर उद्धघाटन किया। इस अवसर पर दशलक्षण पर्व एवं पुष्पदंत भगवान के मोक्ष कल्याणक पर शनिवार को कुन्दनमल, संजय जैन, दीपक जैन कठमाणा परिवार को भगवान पुष्पदंत जी का निर्वाण लाडू चढ़ाने का सौभाग्य मिला। दशलक्षण धर्म के दौरान चोथे दिन उत्तम शौच धर्म की आराधना में शौच शब्द की निष्पति 'शुचेर्भाव: शौचम्' से हुई। इसका अर्थ पवित्रता, स्वच्छता, शुद्ध होना, निर्मल होना शौच धर्म है। आर्यिका सुलक्ष्य मति माताजी ने शौच धर्म पर धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा कि उत्तम शौच धर्म में लोभ कषाय सबसे बड़ा कषाय है। लोभ पाप का बाप है। घर पर बैठे बैठे कषाय नष्ट नहीं होने वाली है। कषाय को एक निर्ग्रन्थ मुनिराज ही नष्ट कर सकते हैं।
क्रोध, मान, माया, लोभ चार कषाय पर प्रकाश डालते हुए कहा कि सेना को नष्ट कर सकते हो परन्तु राजा को नष्ट करना मुश्किल है। उन्होंने कहा कि जो परम मुनि इच्छाओं को रोककर और वैराग्य के विचारों से युक्त होकर आचरण करता है उसका शौच धर्म कहलाता है। उन्होंने कहा कि लोभ के निमित्त से आत्मा अपवित्र हो जाती है। जब मन पवित्र होगा तभी धन सम्पत्ति आदि की प्राप्ति में बुद्धि लगती है। यदि मन स्वच्छ नहीं होगा तो सब व्यर्थ हो जाता है। मन शुचिता के बिना मन में जिनोपदेश नही ठहर सकता। वीतराग प्रभु का चिंतवन स्मरण नहीं हो सकता, गुणों की स्तुति भी नहीं हो सकती है। उन्होंने कहा कि जैसे जैसे जीव लोभ कषाय को त्यागता है वैसे वैसे ही आत्मा की ओर बढ़ता है एवं शुचिता को प्राप्त करता है।
हमारा लक्ष्य आत्मा शुद्धि की ओर होना चाहिए। इसके लिए अंतरंग लोभ कषाय त्यागना तो अति आवश्यक है साथ ही बहिरंग लोभ कषाय त्यागना भी अति आवश्यक है। पर्युषण पर्व के चोथे दिन शिविर में सुबह आचार्य सुन्दर सागर महाराज, मुनि सुधेर्य सागर महाराज, मुनि सुगम सागर महाराज, मुनि श्रुंताश सागर महाराज, आर्यिका चिन्तन मति माताजी, आर्यिका सुलक्ष्य मति माताजी ने धर्म सभा का संचालन करके शिविर का आगाज किया। इस अवसर पर सुशील नीरा जैन, हुकमचंद पारसमल जैन, महावीर प्रसाद पराणा, विष्णु बोहरा, शंभु कठमाणा, महावीर प्रसाद माधोराजपुरा, महेंद्र चंवरिया, महेंद्र सारसोप, जितेन्द्र झिलाय, विमल बगड़ी, योगेन्द्र झिलाय, सुनील बनेठा, विनोद जैन, राहुल माधोराजपुरा, शुभम कठमाणा, त्रिलोक रजवास, प्रियांशु जैन, संजय सिरस, संयम रजवास, शास्वत भाणजा, सहित कई लोगों ने श्री फल चढ़ाकर पुण्यार्जन किया।
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