विश्व जैव ईंधन दिवस: कचरे से कंचन बनाने की राह

विश्व जैव ईंधन दिवस पर भारत में वैकल्पिक ईंधन के महत्व पर जोर, आयात पर निर्भरता घटाने और कृषि अपशिष्ट के बेहतर इस्तेमाल की दिशा में अहम कदम

Aug 11, 2026 - 00:16
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विश्व जैव ईंधन दिवस: कचरे से कंचन बनाने की राह
विश्व जैव ईंधन दिवस: कचरे से कंचन बनाने की राह

नई दिल्ली: हर साल 10 अगस्त को विश्व जैव ईंधन दिवस मनाया जाता है। यह दिन पेट्रोल-डीजल जैसे जीवाश्म ईंधन के विकल्प के रूप में पर्यावरण-अनुकूल जैव ईंधन के महत्व को रेखांकित करता है। जैव ईंधन का इतिहास आधुनिक इंजन के विकास के दौर से जुड़ा है। 10 अगस्त 1893 को मैकेनिकल इंजीनियर सर रुडोल्फ डीजल ने मूंगफली के तेल से डीजल इंजन चलाने का सफल प्रयोग किया था। डीजल ने उसी दौर में यह भविष्यवाणी भी की थी कि आने वाले समय में वनस्पति तेल जीवाश्म ईंधन का विकल्प बन सकते हैं।

 भारत सरकार के पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने वर्ष 2015 से 10 अगस्त को आधिकारिक तौर पर विश्व जैव ईंधन दिवस मनाना शुरू किया, जिसका उद्देश्य देश में जैव ईंधन के प्रति जागरूकता बढ़ाना है। जैव ईंधन मुख्य रूप से कृषि अवशेष, फसलों के कचरे, पेड़-पौधों, गोबर और इस्तेमाल किए जा चुके कुकिंग ऑयल जैसे जैविक स्रोतों से तैयार किए जाते हैं। बायो-इथेनॉल गन्ने के रस, मक्का, सड़े हुए आलू या खराब अनाज से तैयार किया जाता है और इसे पेट्रोल में मिलाया जाता है। बायो-डीजल गैर-खाद्य तेलों, जैसे रतनजोत या जेट्रोफा, जानवरों की चर्बी और रेस्तरां से बचे पाम ऑयल से बनाया जाता है।

 बायो-सीएनजी या कंप्रेस्ड बायोगैस (सीबीजी) गोबर, पुआल और गीले कचरे को सड़ाकर बनने वाली मीथेन गैस को रिफाइन करके तैयार की जाती है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़ी मात्रा में कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस का आयात करता है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, देश अपनी जरूरत का 82 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल और 44 प्रतिशत प्राकृतिक गैस विदेशों से आयात करता है। इथेनॉल और बायो-डीजल के मिश्रण से भारत को हर साल विदेशी मुद्रा की बचत हो रही है। जैव ईंधन कृषि अपशिष्ट के बेहतर इस्तेमाल का भी माध्यम बन रहा है। पहले पराली और अन्य कृषि अवशेष जलाने वाले किसान अब इन्हें फैक्ट्रियों को बेचकर अतिरिक्त आय हासिल कर सकते हैं।

 जैव ईंधन के इस्तेमाल से कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने में भी मदद मिल सकती है। जीवाश्म ईंधन की तुलना में जैव ईंधन को लगभग कार्बन-न्यूट्रल माना जाता है क्योंकि इनमें पौधों द्वारा हाल में सोखे गए कार्बन का चक्रण होता है।

 

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SJK News Chief Editor (SJK News)