“त्याग करना या करवाना नहीं, त्याग की भावना बनाना और प्रभावना बढ़ाना ही उत्तम त्याग धर्म

गुरुवार को जैन मंदिरों में होगी दशलक्षण पर्व के नवें दिवस “उत्तम आकिंचन धर्म” की आराधना

Sep 23, 2026 - 15:04
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“त्याग करना या करवाना नहीं, त्याग की भावना बनाना और प्रभावना बढ़ाना ही उत्तम त्याग धर्म

प्रेस विज्ञप्ति बुधवार, दिनांक 23 सितंबर 202

जयपुर। दशलक्षण महापर्व के आठवें दिन बुधवार को दुनियाभर के दिगंबर जैन मंदिरों में “उत्तम त्याग धर्म” की आराधना की गई। जैन मंदिरों में श्रीजी के जयकारों के साथ श्रद्धालुओं ने त्याग, दान और परोपकार की भावना को जीवन में अपनाने का संकल्प लिया। बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाओं ने पूजन में शामिल होकर “उत्तम त्याग धर्म” की प्रभावना की।

मानसरोवर के न्यू सांगानेर रोड स्थित इंजीनियर्स कॉलोनी के दिगंबर जैन मंदिर में दशलक्षण पर्व के आठवें दिन “उत्तम त्याग धर्म” की मंगल शुरुआत प्रातः 6 बजे श्रीजी के स्वर्ण एवं रजत कलशों से कलशाभिषेक एवं शांतिधारा के साथ हुई। इसके पश्चात श्रावक-श्राविकाओं ने नित्य नियम पूजन के साथ “उत्तम त्याग धर्म विधान” की पूजा-अर्चना की। अष्ट द्रव्यों के साथ अर्घ्य समर्पित कर श्रद्धालुओं ने कर्मों की निर्जरा एवं त्याग की भावना के साथ जिनेन्द्र प्रभु की आराधना की।

अखिल भारतीय दिगंबर जैन युवा एकता संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष अभिषेक जैन बिट्टू ने शास्त्रों के अनुसार उत्तम त्याग धर्म का महत्व बताते हुए कहा कि—* “चिड़िया चोंच भर ले गई, नदी न घट्यो नीर। देत-देता धन ना घटे, कह गए दास कबीर।

उन्होंने बताया कि दान चार प्रकार के माने गए हैं *औषधदान, शास्त्रदान, अभयदान और आहारदान* उत्तम त्याग धर्म दान की महिमा का संदेश देता है। “अनुग्रहार्थं स्वस्यातिसर्गो दानम्” अर्थात स्वयं एवं दूसरों के अनुग्रह के लिए अपने धन आदि का त्याग करना दान कहलाता है।

उन्होंने कहा कि गृहस्थ जीवन में दान और पूजा का विशेष महत्व है। धन केवल अपने पास रखने से सार्थक नहीं होता, बल्कि उसका सदुपयोग करने से उसका महत्व बढ़ता है। धन की तीन गतियां बताई गई हैं—दान, भोग और नाश। यदि धन का उचित उपयोग नहीं किया जाए तो अंततः उसकी गति नाश की ओर होती है।

अभिषेक जैन बिट्टू ने कहा कि *समुद्र का जल खारा और नदियों का जल मीठा होता है, क्योंकि समुद्र जल को संचित करता है, जबकि नदियां अपना जल निरंतर प्रवाहित करती हैं। इसी प्रकार जो धन का सदुपयोग करता है, उसका धन सार्थक होता है, जबकि केवल संग्रह करने की प्रवृत्ति अंततः धन को निष्फल बना देती है।* “जोड़ कर रख लो चाहे लाख हीरे-मोती, मगर याद रखना, कफन में जेब नहीं होती।”

उन्होंने कहा कि जरूरतमंदों की सहायता, धार्मिक कार्यों में सहयोग, आहारदान, औषधदान, शास्त्रदान और अभयदान के माध्यम से समाज एवं मानवता के प्रति अपने दायित्वों का निर्वहन किया जा सकता है। त्याग केवल वस्तु छोड़ने का नाम नहीं, बल्कि त्याग की भावना को जीवन में उतारना और उसकी प्रभावना बढ़ाना ही उत्तम त्याग धर्म का सार है।

अभिषेक जैन बिट्टू ने बताया कि बुधवार से तीन दिवसीय “झर का तेले” निर्जल उपवास भी प्रारंभ हो गए हैं। बड़ी संख्या में तपस्वी निर्जल उपवास रखकर दशलक्षण महापर्व की आराधना एवं प्रभावना में सहभागी बन रहे हैं। सभी त्यागी-वृत्तियों का सामूहिक पारणा 26 सितंबर को कराया जाएगा। गुरुवार को दशलक्षण महापर्व के नवें दिन “उत्तम आकिंचन धर्म” मनाया जाएगा। इस अवसर पर जैन मंदिरों में विशेष पूजन एवं धार्मिक आराधना के साथ श्रद्धालु आकिंचन्य धर्म के संदेश को आत्मसात करेंगे।

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SJK News Chief Editor (SJK News)