जिनेन्द्र देव का हुआ सामूहिक कलशाभिषेक, उमड़ा जनसैलाब
प्रत्येक प्राणी पर क्षमा भाव धारण करना वीरों का भूषण है। आचार्य सुन्दर सागर महाराज
निवाई - श्री दिगम्बर जैन शांतिनाथ मंदिर में विराजमान आचार्य सुन्दर सागर महाराज ने पर्युषण पर्व की समाप्ति एवं क्षमावाणी महोत्सव पर धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा कि शत्रु एवं मित्र दोनों को क्षमा करना यतियों का भूषण है। प्रत्येक प्राणी पर क्षमा भाव धारण करना वीरों का भूषण है। आचार्य श्री सुन्दर सागर महाराज ने रविवार को क्षमावाणी पर्व पर धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा कि उत्तम क्षमा धर्म दश धर्मों में प्रथम धर्म है। सामान्यतया इसका अर्थ यह माना जाता है कि किसी प्राणी को कष्ट नहीं पहुंचाना, या किन्हीं अप्रिय एवं अनचाही घटनाओ पर क्रोध न करना क्षमा है। यह क्षमा आत्मा का स्वाभाविक गुण हैं। जब यह आत्मा स्वभाव से च्युत होकर विभाव में पहुंच जाती है तब रागी द्वेषी क्रोधी इत्यादि कहलाती है क्योंकि यह आत्मा स्वभाव से सरल एवं क्षमावान है।
क्रोध मनुष्य को अन्धा बना देता है। पूज्य गुरु मां आर्यिका सुलक्ष्य मति माताजी ने धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा कि संसार में प्रत्येक मानव के लिए क्षमारूपी शस्त्र इतना आवश्यक है कि जिसके पास यह क्षमा नहीं होती वह मनुष्य संसार में अपने इष्ट कार्य की सिद्धि नहीं कर सकता। उन्होंने कहा कि क्षमा आत्मा का धर्म है इसलिए जो मानव अपना कल्याण चाहता है उसे हमेशा इस भावना की रक्षा करनी चाहिए। क्षमावान मनुष्य का इस लोक और परलोक में कोई शत्रु नहीं होता। क्षमा ही सर्व धर्म का सार है। क्षमा सम्यगदर्शन, ज्ञान, चारित्र रूपी आत्मा का मुख्य सच्चा भण्डार है। क्षमा धर्म वीर पुरुष का भूषण है।
जैन समाज के प्रवक्ता विमल जौंला एवं राकेश संधी ने बताया कि रविवार को पर्युषण पर्व की समाप्ति पर आचार्य सुन्दर सागर महाराज, आर्यिका चिन्तन मति माताजी, आर्यिका सुलक्ष्य मति माताजी संध के सानिध्य में श्री दिगम्बर जैन बड़ा मंदिर एवं बिचला जैन मंदिर में जयकारों के साथ जिनेन्द्र देव का सामूहिक कलशाभिषेक समारोह आयोजित किया गया जिसमें हजारों श्रद्धालुओं ने भाग लिया। प्रवक्ता विमल जौंला एवं राकेश संधी ने बताया कि चतुर्दशी को भगवान की माला पहनने का सौभाग्य श्रावक श्रेष्ठी श्रवण मल, बोनू जैन, ज्योति जैन शाह बोली वाले, एवं राजकुमार संधी, रितिक संधी एवं केसर लाल, फूल चंद, उत्सव कुमार, जैन जगतपुरा को एवं जयन्त जैन को जिनेन्द्र देव की माला पहनने का सौभाग्य मिला। इस दौरान श्रद्धालुओं ने जिनेन्द्र देव को पालकी में विराजमान करके गाजे बाजे एवं मंगल बधाई गीतों के साथ वेदी में विराजमान किया।
What's Your Reaction?

