“क्षमा वीरस्य भूषणम्” — क्षमा वीरों का अनमोल आभूषण

क्षमा मांगने वाला नहीं बल्कि क्षमा धारण करने वाला होता है सबसे बड़ा वीर --- जैन मंदिरों में श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ मनाया गया क्षमावाणी पर्व, संतों के सानिध्य में हुई शांतिधारा एवं पूजन-अर्चना

Sep 27, 2026 - 21:43
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“क्षमा वीरस्य भूषणम्” — क्षमा वीरों का अनमोल आभूषण

जयपुर। धर्म नगरी जयपुर सहित देश-दुनिया के दिगंबर जैन मंदिरों में रविवार को क्षमावाणी पर्व श्रद्धा, भक्ति और आत्मशुद्धि के भावों के साथ मनाया गया। इस अवसर पर विभिन्न जैन मंदिरों में संतों एवं आर्यिका माताओं के सानिध्य में विशेष धार्मिक आयोजन हुए। श्रीजी को पांडुकशिला पर विराजमान कर पंचामृत एवं जल से कलशाभिषेक, वृहद शांतिधारा, अष्टद्रव्य पूजन एवं धार्मिक अनुष्ठान किए गए। संतों एवं साध्वियों ने मंगल प्रवचनों के माध्यम से क्षमा के महत्व को समझाते हुए समाजबंधुओं से जाने-अनजाने में हुई भूलों के लिए एक-दूसरे से क्षमा मांगने और सभी के प्रति क्षमाभाव रखने का आह्वान किया।

*अखिल भारतीय दिगंबर जैन युवा एकता संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष अभिषेक जैन बिट्टू ने क्षमावाणी पर्व के महत्व पर कहा कि* “क्षमा वीरस्य भूषणम्” अर्थात क्षमा वीरों का सबसे अनमोल आभूषण है। क्षमा मांगना कमजोरी नहीं, बल्कि साहस, विनम्रता और आत्मबल का परिचायक है। जो व्यक्ति अपने अहंकार को छोड़कर बिना किसी संकोच के अपनी भूल स्वीकार कर क्षमा मांग लेता है और दूसरे की भूल को भी बड़े हृदय से क्षमा कर देता है, वही वास्तविक अर्थों में वीर है।

उन्होंने कहा कि गलतियां जानबूझकर भी होती हैं, भूलवश भी होती हैं और कई बार अनजाने में भी किसी के मन को ठेस पहुंच जाती है। इसलिए क्षमावाणी केवल एक दिन का पर्व नहीं, बल्कि अपने भीतर के राग-द्वेष, अहंकार और कटुता को समाप्त करने का संकल्प है। क्षमा मांगने वाला या क्षमा देने वाला न छोटा होता है और न बड़ा, बल्कि क्षमा के भावों को धारण करने वाला व्यक्ति अपने जीवन में विश्वास, आत्मबल और सकारात्मकता का निर्माण करता है।

“क्षमा ऐसा आभूषण है, जो जीवन को भीतर से स्वर्ण की तरह निखार देता है”

अभिषेक जैन बिट्टू ने कहा कि क्षमा केवल शब्द नहीं, बल्कि एक भाव है, जिसे प्रत्येक प्राणी को अपने जीवन में धारण करना चाहिए। क्षमा का भाव व्यक्ति को दूसरों पर विश्वास करना सिखाता है और स्वयं के भीतर भी आत्मविश्वास पैदा करता है। मतभेद को मनभेद बनने में देर नहीं लगती, लेकिन सच्चे क्षमाभाव से वर्षों पुरानी कटुता भी प्रेम और विश्वास में परिवर्तित हो सकती है।

उन्होंने कहा कि क्षमावाणी केवल श्रावक-श्राविकाओं का पर्व नहीं है, बल्कि यह आत्मशुद्धि और संयम का ऐसा पर्व है जिसमें साधु-साध्वी समाज भी सभी जीवों के प्रति क्षमाभाव प्रकट करता है। “ उत्तम क्षमा, सबसे क्षमा, सबको क्षमा” के भाव के साथ एक-दूसरे से क्षमा मांगना जैन दर्शन की उस महान परंपरा को दर्शाता है, जिसमें स्वयं की भूल स्वीकार करने और दूसरों की भूल को क्षमा करने को आत्मकल्याण का माध्यम माना गया है।

शहरभर के जैन मंदिरों में मनाई गई क्षमावाणी

अखिल भारतीय दिगंबर जैन युवा एकता संघ के राष्ट्रीय सचिव प्रमोद बाकलीवाल ने बताया कि जयपुर शहर एवं आसपास के क्षेत्रों के विभिन्न दिगंबर जैन मंदिरों में क्षमावाणी पर्व पर विशेष आयोजन हुए। बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाओं ने मंदिरों में पहुंचकर अभिषेक, शांतिधारा एवं पूजन-अर्चना में भाग लिया तथा संतों के मंगल प्रवचन सुने।

इस अवसर पर समाजबंधुओं ने एक-दूसरे से “उत्तम क्षमा, सबसे क्षमा, सबको क्षमा” कहते हुए जाने-अनजाने में हुई भूल-चूक के लिए क्षमा मांगी और क्षमा प्रदान की।

ना कोई छोटा, ना कोई बड़ा—क्षमावाणी ने मिटाए राग-द्वेष

क्षमावाणी पर्व किसी को छोटा या बड़ा साबित करने का पर्व नहीं, बल्कि “इंसान को इंसान से जोड़ने और मन से मन की दूरी मिटाने का पर्व” है। इस दिन समाजबंधु एक-दूसरे के गले मिलकर, चरण स्पर्श कर अथवा हाथ जोड़कर अपनी भूलों के लिए क्षमा याचना करते हैं और मन में बसे राग-द्वेष को समाप्त करने का संकल्प लेते हैं।

समाजबंधुओं ने एक-दूसरे को खोपरा-मिश्री खिलाकर प्रेम, सौहार्द और क्षमा का संदेश दिया

अखिल भारतीय दिगंबर जैन युवा एकता संघ ने क्षमावाणी पर्व पर सभी समाजबंधुओं सहित जगत के प्रत्येक प्राणी से विनम्र भाव से कहा— “हमारे मन, वचन अथवा कर्म से जाने-अनजाने में किसी भी जीव को तन, मन या वचन से ठेस पहुंची हो, किसी के हृदय को दुःख हुआ हो अथवा किसी भी प्रकार की भूल हुई हो तो हम हृदय से क्षमायाचना करते हैं।

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SJK News Chief Editor (SJK News)