माही के तट पर सुकून लुटाती है वागड़ की दीपावली!

अरावली की वादियों में गूँजता है लोकउल्लास

Nov 7, 2026 - 19:35
Nov 7, 2026 - 19:51
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माही के तट पर सुकून लुटाती है वागड़ की दीपावली!

भारत में दीपावली केवल दीपों की कतारें सजाने, लक्ष्मी-पूजन करने और आतिशबाजी के बीच खुशियाँ मनाने का पर्व नहीं है। यह देश की विविधतापूर्ण लोकसंस्कृतियों, परंपराओं और सामुदायिक जीवन का ऐसा उत्सव है, जिसके रंग देश के अलग-अलग भूभागों में अलग-अलग रूपों में दिखाई देते हैं। कहीं यह कृषि समृद्धि का प्रतीक बनता है, कहीं पशुधन के प्रति कृतज्ञता का अवसर, तो कहीं पूर्वजों के स्मरण और लोकदेवताओं की आराधना का विशेष अनुष्ठान।

भारत के वनांचलों, पर्वतीय अंचलों और दूरस्थ ग्रामीण बस्तियों में दीपावली की ऐसी अनेक परंपराएँ आज भी जीवित हैं, जो हमारी सांस्कृतिक विरासत को विशिष्ट पहचान देती हैं।

राजस्थान, मध्यप्रदेश और गुजरात की सांस्कृतिक सीमाओं को आत्मीयता से जोड़ने वाली माही नदी के तटवर्ती क्षेत्र में बसा वागड़ अंचल भी दीपावली के ऐसे ही अनूठे लोकवैभव का साक्षी है। बाँसवाड़ा और डूंगरपुर जिलों के आदिवासी बहुल ग्रामीण परिवेश में दीपावली का उल्लास किसी एक दिन अथवा एक रात तक सीमित नहीं रहता। यहाँ उत्सव की उमंग पखवाड़े भर तक लोकजीवन में रंग भरती है।

अरावली की पहाड़ियों, माही के जलप्रवाह, खेतों की हरियाली और गाँवों की सामूहिक जीवनशैली के बीच दीपावली अपने पारंपरिक स्वरूप में एक अलग ही आनंदलोक रचती है।

सामाजिक उल्लास का विराट पर्व

प्रकृति के सान्निध्य में जीवन जीने वाले वागड़ के आदिवासी समुदायों के लिए दीपावली मेल-मिलाप, पारिवारिक आत्मीयता और सामुदायिक सहभागिता का महत्त्वपूर्ण अवसर है। इस पर्व पर गाँवों में चहल-पहल बढ़ जाती है। घरों की साफ-सफाई, रंग-रोगन, पकवानों की तैयारी, पशुधन का श्रृंगार और रिश्तेदारों के आगमन के साथ उत्सव का वातावरण बनने लगता है।

यहाँ दीपावली का आनंद केवल घरों की देहरी तक नहीं ठहरता, बल्कि खेतों, पशुशालाओं, चौपालों, मंदिरों और गाँव के सार्वजनिक स्थलों तक फैल जाता है। पुरातन लोकपरंपराओं के साथ समय के अनुरूप नए उत्सवी सरोकार भी जुड़ते गए हैं। इस प्रकार वागड़ की दीपावली परंपरा और परिवर्तन के सुंदर समन्वय का उदाहरण प्रस्तुत करती है।

मूक पशु भी होते हैं दीपावली के उत्सव में सहभागी

खेती और पशुपालन वागड़ के ग्रामीण जीवन की आधारशिला रहे हैं। यहाँ गाय, बैल, भैंस और अन्य पशु केवल आजीविका के साधन नहीं, बल्कि परिवार की आर्थिक समृद्धि और जीवनचर्या के अभिन्न अंग हैं। यही कारण है कि दीपावली के अवसर पर मनुष्यों के साथ पशुधन को भी उत्सव में सहभागी बनाया जाता है।

पशुपालक अपने पशुओं को नहलाते-धुलाते हैं, उनके सींगों और खुरों को सजाते हैं तथा शरीर पर रंग-रोगन करके उनका सौन्दर्य निखारते हैं। उन्हें विशेष आहार दिया जाता है और कई स्थानों पर उनका मुँह मीठा कराया जाता है। रूप चौदस के दिन भी पशुओं के श्रृंगार की परंपरा प्रचलित है। कुछ गाँवों में पशुओं की दौड़ आयोजित की जाती है, जिसमें बड़ी संख्या में ग्रामीण उत्साहपूर्वक भाग लेते हैं। इन दौड़ों के परिणामों को लेकर लोकविश्वासों के आधार पर आगामी समय और कृषि-परिस्थितियों के संकेत भी निकाले जाते हैं। मोटा टाण्डा क्षेत्र में गायों को ‘हुरड़े’ चढ़ाने की परंपरा भी इसी लोकविश्वास से जुड़ी बताई जाती है। इन प्रथाओं में पशुधन के प्रति सम्मान, आत्मीयता और ग्रामीण जीवन की आर्थिक निर्भरता सहज रूप से अभिव्यक्त होती है।

नवदम्पतियों की दीपावली - ‘दीवाली आणा’ का उल्लास

वागड़ के दक्षिणांचल में ‘दीवाली आणा’ की परंपरा दीपावली के सामाजिक और पारिवारिक पक्ष को विशेष रंग प्रदान करती है। विवाह के बाद नवदम्पति की पहली दीपावली पर इस रस्म का आयोजन किया जाता है।  इसमें परिवारजन और नाते-रिश्तेदार नवविवाहित जोड़े के साथ एकत्र होते हैं। पकवान बनाए जाते हैं, वस्त्र एवं अन्य उपहार भेंट किए जाते हैं और सामूहिक रूप से दीपावली का उत्सव मनाया जाता है। यह रस्म नवदम्पति को परिवार और रिश्तेदारी के व्यापक दायरे से जोड़ने का अवसर बनती है। विवाह के बाद नए जीवन की शुरुआत कर रहे जोड़े के लिए यह आत्मीय स्वागत और सामाजिक स्वीकार्यता का उत्सवी प्रतीक है।

‘मेरिया’ से होता है उजाले का आह्वान

वागड़ की दीपावली में ‘मेरिया’ का विशेष आकर्षण है। यह केवल रोशनी करने का साधन नहीं, बल्कि स्थानीय लोकविश्वासों और पारिवारिक परंपराओं से जुड़ा एक विशिष्ट प्रतीक है।

गन्ने के डंठल पर वस्त्र, रूई और मिट्टी आदि की सहायता से पाँच अथवा उससे अधिक बत्तियों वाली मशाल तैयार की जाती है। इसे तेल में भिगोकर प्रज्वलित किया जाता है। इसी मशाल को स्थानीय बोली में ‘मेरिया’ कहा जाता है। कहीं इसे दीपावली की संध्या के बाद तो कहीं प्रातःकाल प्रदर्शित किया जाता है।

घर के बड़े-बुजुर्ग मेरिया तैयार कर उसे प्रज्वलित करते हैं और बच्चों के हाथों में सौंपते हैं। सर्वप्रथम भगवान के समक्ष मेरिया दिखाया जाता है। इस दौरान स्थानीय लोकवाणी में परंपरागत शब्दों का उच्चारण किया जाता है- “आल दीवारी, काल दीवारी, पमने दाड़े मेरियू... राजा रामचन्द्रजी नू मेरियू...”

इन लोकवाक्यों के माध्यम से उजाले, मंगल और समृद्धि का आह्वान किया जाता है। नवदम्पति भी मेरिया दिखाते हैं। इस अवसर पर परिवारजन और संबंधी उसमें तेल डालकर अपनी सहभागिता व्यक्त करते हैं। लोकमान्यता में यह तेल पारिवारिक खुशहाली, सामुदायिक सहयोग और प्रकाश के विस्तार का प्रतीक माना जाता है।

धनतेरस से ही आरम्भ हो जाता है उत्सवी उल्लास

यद्यपि दीपावली की तैयारियाँ कई दिन पहले शुरू हो जाती हैं, लेकिन वागड़ में उत्सव का वातावरण विशेष रूप से धनतेरस से मुखर होने लगता है। इस दिन सूर्यास्त के बाद घरों, मंदिरों और अन्य धार्मिक स्थलों पर दीपों की श्रृंखलाएँ सजाई जाती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में संध्या के समय नारियल अथवा धूप से हवन करने की परंपरा भी कुछ स्थानों पर प्रचलित है। धनतेरस को अनाज तथा धनराशि किसी को उधार न देने की लोकमान्यता भी कई परिवारों में देखने को मिलती है। माना जाता है कि इन दिनों घर से धन अथवा अन्न बाहर देने से वर्षभर आर्थिक संसाधनों के बाहर जाने का क्रम बना रहता है। यह लोकविश्वास समृद्धि को घर में बनाए रखने की पारंपरिक कामना से जुड़ा है।

दीपों से जगमगाते घर, लक्ष्मी के स्वागत की तैयारी

रूप चतुर्दशी और दीपावली की संध्या को घरों के भीतर-बाहर दीपक जलाए जाते हैं। आँगन, देहरी, पूजा-कक्ष और घर के प्रत्येक हिस्से को रोशनी से सजाने की परंपरा है। दीपावली की रात्रि में लक्ष्मी-पूजन और अन्य धार्मिक अनुष्ठान सम्पन्न किए जाते हैं। लोकमान्यता है कि इस रात लक्ष्मी घर-घर विचरण करती हैं और जिस घर में प्रकाश, स्वच्छता तथा मंगलमय वातावरण होता है, वहाँ उनका स्वागत होता है। इसी विश्वास के चलते कई परिवार पूरी रात दीपक प्रज्वलित रखने का प्रयास करते हैं।

‘अरे काड़ना’ - प्रतीकात्मक रूप से विदा करते हैं दरिद्रता को

दीपावली के अगले दिन अर्थात् कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा की भोर में वागड़ के कुछ क्षेत्रों में ‘अरे काड़ना’ नामक विशिष्ट परंपरा निभाई जाती है। इसके अंतर्गत परिवारजन ब्रह्ममुहूर्त में उठकर घर की साफ-सफाई करते हैं। घर का कचरा एक नई मटकी में भरकर बिना बोले घर से दूर किसी स्थान पर रख आते हैं। इस क्रिया को प्रतीकात्मक रूप से दरिद्रता और अमंगल को घर से बाहर निकालने के रूप में देखा जाता है। लोकजीवन में स्वच्छता और शुभता के प्रति जागरूकता को धार्मिक प्रतीक के माध्यम से अभिव्यक्त करने वाली यह परंपरा विशेष महत्त्व रखती है।

‘रामा-शामी’ और ‘जुहार सा’ - रिश्तों में आत्मीयता का उजास

दीपावली के बाद का दिन सामाजिक मेल-मिलाप और पारस्परिक सौहार्द को प्रगाढ़ करने के लिए समर्पित रहता है। वागड़ के विभिन्न क्षेत्रों में इसे ‘रामा-शामी’ अथवा ‘जुहार सा’ कहकर संबोधित किया जाता है। इस दिन लोग एक-दूसरे के घर जाकर अभिवादन करते हैं, बड़ों का आशीर्वाद लेते हैं और परिजनों तथा मित्रों के साथ शुभकामनाओं का आदान-प्रदान करते हैं।

कई स्थानों पर घर आने वाले अतिथियों को गुड़ और नारियल खिलाकर स्वागत करने की परंपरा है। कुछ क्षेत्रों में पारंपरिक हथकढ़ी मदिरा के सेवन का रिवाज भी रहा है। इस प्रकार दीपावली का उत्सव धार्मिक अनुष्ठानों से आगे बढ़कर रिश्तों की आत्मीयता और सामाजिक एकजुटता का माध्यम बनता है।

दिवंगत परिजनों के लिए भी जलते हैं दीप - ‘दीवड़ा’ की अनूठी परंपरा

वागड़ की दीपावली का एक अत्यंत विशिष्ट पक्ष दिवंगत परिजनों के निमित्त किया जाने वाला ‘दीवड़ा’ दीपदान है। इस परंपरा में दीपावली की अलसुबह यमराज और पितरों के निमित्त दीप अर्पित किए जाते हैं। परिवार में वर्षभर के दौरान दिवंगत हुए सदस्यों के नाम और गोत्र का स्मरण कर उनके कल्याण की कामना की जाती है।

लोकविश्वास है कि दीपदान के माध्यम से दिवंगत आत्माओं तक प्रकाश पहुँचता है और उन्हें सद्गति प्राप्त होती है। इस अनुष्ठान में परिवारजन अपने पूर्वजों और पितृपरंपरा का भी स्मरण करते हैं। इस प्रकार दीपावली का उजाला केवल वर्तमान पीढ़ी के उत्सव तक सीमित नहीं रहता, बल्कि दिवंगत परिजनों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता की अभिव्यक्ति भी बन जाता है।

मेलों, लोकनृत्यों और अनुष्ठानों से सजी वागड़ की दीपावली

वागड़ अंचल में दीपावली के अवसर पर अनेक स्थानों पर स्थानीय मेलों, धार्मिक आयोजनों और लोकपरंपराओं की विशेष छटा दिखाई देती है। डूंगरपुर जिले के सकानी में मेरिया लक्ष्य-भेदन की परंपरा, घंटाला और वनाला के गुर्जर समुदाय की दीपावली से जुड़ी रस्में, आबापुरा में हाला देव का मेला तथा विभिन्न स्थानों पर होने वाले दीपावली नृत्य लोकजीवन के उल्लास को जीवंत करते हैं। वहीं छींच स्थित अन्नपूर्णा धाम में अन्नकूट का आयोजन श्रद्धा और सामूहिक भक्ति का वातावरण रचता है।

इन आयोजनों में कहीं लोकदेवताओं के प्रति आस्था दिखाई देती है, कहीं सामूहिक नृत्य और संगीत के माध्यम से उत्सव का उल्लास अभिव्यक्त होता है, तो कहीं अन्नकूट और प्रसाद वितरण के जरिए सामुदायिक सहभागिता का भाव प्रकट होता है। प्रत्येक स्थान की अपनी विशिष्ट परंपरा है, लेकिन इन सबको जोड़ने वाला सूत्र हैकृलोकजीवन की सहजता, प्रकृति के प्रति आत्मीयता और सामूहिक आनंद।

माही के प्रवाह की तरह अविरल है लोकसंस्कृति का उत्सवी वैभव

वागड़ की दीपावली को समझना हो तो इसे केवल दीपों, पूजन और आतिशबाजी के दायरे में नहीं देखा जा सकता। यह पर्व यहाँ खेतों की उपज, पशुधन की समृद्धि, नवदम्पतियों के नए जीवन, परिवारों के पुनर्मिलन, लोकदेवताओं की आराधना और पितरों के स्मरण तक विस्तृत है। इसमें प्रकृति और मनुष्य के बीच का आत्मीय संबंध भी है तथा पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक स्मृतियों का उजास भी।

आधुनिकता के प्रभाव से लोकजीवन में अनेक बदलाव आए हैं, लेकिन वागड़ की ये परंपराएँ आज भी अपनी विशिष्ट पहचान बनाए हुए हैं। इनका संरक्षण केवल अतीत को बचाए रखने का प्रयास नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक विविधता को जीवित रखने का दायित्व है, जो भारत की वास्तविक पहचान है।

माही के तटों पर जब दीपों की पंक्तियाँ सजती हैं, अरावली की वादियों में लोकगीतों की गूँज उठती है, पशुधन का श्रृंगार होता है और परिवार अपने दिवंगतों को भी दीपदान के माध्यम से याद करते हैं, तब दीपावली एक व्यापक लोकमहोत्सव का रूप ले लेती है।

यहाँ दीपावली केवल घरों को रोशन नहीं करती, बल्कि रिश्तों, परंपराओं, स्मृतियों और सामुदायिक जीवन को भी आलोकित करती है। माही के प्रवाह की तरह यहाँ लोकसंस्कृति के रंग-रस अविरल बहते हैं और अरावली की वादियाँ उत्सवी आनंद का वैभव दूर-दूर तक प्रतिध्वनित करती हैं।

 - डॉ. दीपक आचार्य

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SJK News Chief Editor (SJK News)